सूर्योपासना अंतर्गत यमुना छठ

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  • Published on: 2025-04-04 06:18 pm

सूर्योपासना अंतर्गत यमुना छठ

सूर्योपासना से जुड़ा यह छठ पर्व लोक श्रद्धा व विश्वास के साथ सदियों से चला आ रहा है। इस व्रत को पूरी श्रद्धा व निष्ठा से करने करने वालों पर ईश्वरीय कृपा होती है और व्यक्ति की मनोकामनाएं पूर्ण होती है। वैसे भी सूर्य को ऊर्जा का स्रोत माना गया है। इनकी किरणों में रोगनिवारक तत्त्व होते हैं। इसकी उपासना से मानसिक शक्ति एकाग्रता व स्मरण शक्ति में वृद्धि होती है। व्यक्ति के कार्यक्षमता में वृद्धि होती है, जिससे व्यक्ति के मान-सम्मान सामाजिक प्रतिष्ठा में स्वतः वृद्धि हो जाती है।

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भूमिका 

    सूर्य की उपस्थिति अनादि काल से सर्वविदित है। पृथ्वी पर जीव के जीवन की परिकल्पना इसके अभाव में असंभव है। इसी असंभाव्य से संभाव्य परिकल्पना के साथ यथार्थ रूप में आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दोनों दृष्टि से देवता और प्रकृति की अजस्र ऊर्जा स्रोत के रूप में भगवान सूर्य अधिष्ठित हैं। मनुष्य अपने अस्तित्व के संरक्षण और संवर्धन हेतु प्रारंभ से इसकी पूजा अर्चना करते आए हैं। वह चाहे मूर्त रूप में हो या अमूर्त रूप में। सनातन संस्कृति के अंतर्गत वेद इसका प्रमाण है। ऋग्वेद के चौदह सूक्त सूर्योपासना से संबंधित है। वेद, पुराण, उपनिषद, वाल्मीकि कृत रामायण, व्यास रचित महाभारत आदि भी इसके स्तुत्य गान से अछूता नहीं है। हाँ, आदि काल से अबतक इसकी उपासना पद्धति में अंतर देखने को अवश्य मिल सकता है। सूर्य की इन्हीं उपासना पद्धतियों के अंतर्गत छठ का पर्व विशेष रूप से मनाने का प्रचलन है। इसकी विशेष जानकारी हम यहाँ प्राप्त करेंगे। 

शास्त्रों में सूर्योपासना 

    शास्त्रानुसार ऐसा माना जाता है कि भगवान ब्रह्माजी ने सृष्टि रचना के समय जब वे अपने तपोबल से ध्यान किया तो सूर्य को देखा। उनके प्रभाव और शक्ति को देख ब्रह्माजी ने उन्हें नमन करते हुए सृष्टि सृजन का आशीर्वाद प्राप्त किया। एक और मान्यता के अनुसार चैत्र नवरात्रि के पहले दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि का निर्माण किया था। निर्माण के समय संसार अंधकारमय था। चारों ओर जल ही जल था और श्रीहरि योगमाया के बंधन में बंधे शयन कर रहे थे। सृष्टि निर्माण के छठे दिन बाद ब्रह्माजी ने सौर-मण्डल का निर्माण किया। श्रीहरि के नेत्र खुलते ही सूर्य और चंद्रमा बने और योगमाया ने ब्राह्मी शक्ति से जन्म लिया जिसका नाम देवसेना पड़ा। सूर्य की पहली किरण को भी देवसेना कहा जाता है। यह प्रकृति का छठा रूप होने के कारण इसका नाम षष्ठी है। इसी करण लोक में यह छठी मैया के नाम से प्रचलित है। शिशु के जन्म के छठे दिन उसके स्वास्थ्य, सफलता और दीर्घायु के लिए इसकी पूजा की जाती है। पुराणों में इस षष्टि की देवी को माँ कात्यायनी कहा गया है।  

    इससे यह स्पष्ट है कि सूर्य का अस्तित्व और महत्त्व अनादि काल से है। भुवनभास्कर भगवान सूर्यनारायण को प्रत्यक्ष देवता माना गया है क्योंकि यह पृथ्वी वासियों के लिए जीवन दायिनी है। हमारे वैदिक ग्रंथों ‘सूर्य आत्मा जगतस्त स्थुषश्च’ (ऋग्वेद 1/115/1) कहकर उनके अस्तित्व को समस्त चराचर जगत में विद्यमान मानकर स्तुतिगान किया गया है। निरुक्त में इसे ‘सविता सर्वस्य प्रसविता’ (निरुक्त 10/31) के साथ इसे सृष्टि करने वाला (सविता) कहा गया है। सृष्टि के कारण रूप सूर्य को उदय से अस्त तक उद्भावक, जागरणकर्ता और संचालनकर्ता के साथ रात्रि में प्राणियों को विश्राम देनेवाला माना गया है। कहा जाता है कि वेदों के अनेक देवता हिन्दू धर्म में विलीन होकर एक देव बन गए हैं जिन्हें सूर्य कहा जाता है। आरंभ में सूर्य की उपासना प्रतीक रूप में होती थी, परंतु बाद में इसके विशेषज्ञ शाकद्वीपीय मग ब्राह्मणों द्वारा इसे मूर्ति रूप में किया जाने लगा। प्रो. कृष्ण दत्त बाजपेयीअपनी पुस्तक ‘प्राचीन कला में सूर्य का अंकन’ में लिखते हैं कि ‘ईरान के सूर्य पूजक पुजारियों का आगमन ईसा पूर्व प्रथम शती से विशेष रूप में होने लगा था। हमारे यहाँ उन्हें अच्छा सम्मान मिला। उनके प्रयास से उत्तर पश्चिम भारत में अनेक स्थानों पर सूर्य मंदिरों और प्रतिमाओं का निर्माण हुआ।’ ऋग्वेद में कण्वतनय महर्षि प्रषकण्व ने अपने रोग निवारण हेतु सूर्यदेव से प्रार्थना करते हुए कहते हैं – 

उद्यन्नद्य मित्रमह आरोह्न्नुतरां दिवम् ।

हद्रोगं मम सूर्यहरिमाणं च नाशय ।। (ऋग्वेद 1/50/11)

अर्थात, हे सूर्यदेव ! आज उदय होते हुए और आकाश में अग्रसर होते हुए आप मेरे हृदय रोग को दूर कर दीजिए और शरीर की विवर्णता को नष्ट कर दीजिए । वेदों में सूर्य आराधना को पापहारी, रोगनासक, विष-विध्वंसक बताया गया है। इसे वैदिक देवता मानते हुए ऋग्वेद  (7/62/2), कौषीतकी ब्राह्मण उपनिषद् 2/7, आश्वलायन गृह्यसूत्र एवं तैतिरीय आरण्यक में विधि-विधान से इसकी उपासना पद्धति बताई गई है। यहाँ तक कि वेदों में इसे विष्णु का पर्यायवाची भी माना गया है। छान्दोग्य उपनिषद् में सूर्योपासना से होने वाली आध्यात्मिक उन्नत्तियों का वर्णन करते हुए कहा गया है - ‘या एवासौ तपति तमुद्गीथमुपासीत्’ (छान्दोग्य उपनिषद् 3/3/1)। नारायणोपनिषद सूर्य को कालचक्र का कारण मानते हैं। उनका मानना है कि सूर्य से ही घटी, पल, दिन, रात, पक्ष, मास, अयन तथा सम्वत् आदि का विधान है। इसे सम्पूर्ण संसार के प्रकाशक के रूप में महिमामण्डित किया गया है। नारायणोपनिषद के अनुसार सूर्य ही जीवन तेज, ओज, बल, यश, चक्षु, श्रोत्र, आत्मा और मन है।

    वाल्मीकि रामायण में ‘आदित्यहृदयस्तोत्र’ का वर्णन है जिसमें स्वयं भगवान् राम इस स्त्रोत्र से सूर्य की उपासना कर रहे हैं। मार्कण्डेय पुराण के 98 व 99 अध्याय में सूर्य को ब्रह्मस्वरूप मानते हुए कहा गया है कि भूतों से बना हुआ सूर्य रूप एक अंडा है और उसके अंदर जो छुपा हुआ बीज है उसे ‘हिरण्य’ कहते हैं। वह जब जाग उठता है तो वहीं हिरण्यगर्भ मार्तंड बन जाता है।’ (वीएस अग्रवाल, मार्कण्डेय पुराण : एक सांस्कृतिक अध्ययन) सूर्य सर्वभूतस्वरूप सर्वात्मा और सनातन परमात्मा व वेदस्वरूप हैं। वेदस्वरूप होने के करण इसे त्रयीतनु भी कहते हैं। ऐसा बताया गया है कि जब ब्रह्मा अण्डभेदन कर उत्पन्न हुए तो उनके मुख से महाशब्द का उच्चारण हुआ। यह ओंकार परब्रह्म है एवं यही सूर्यदेवता का शरीर है। इस ओंकार से पूर्व ‘भू’ फिर ‘भुव:’ और बाद में ‘स्व:’ उत्पन्न हुआ। ये तीनों व्याहृतियां हैं जो सूर्य के सूक्ष्म रूप हैं। पुनः इनसे मह:, जन:, तप: और सत्यम उत्पन्न हुआ जो स्थूल से स्थूलतम होता गया और शब्द ब्रह्म से भगवान् सूर्य का स्वरूप प्रकट हुआ।      

सूर्य देवता और छठ पूजन 

    भगवान् सूर्य के स्वरूप, प्राकट्य-कथा, शक्ति, महिमा एवं उपासना प्रक्रिया को मत्स्यपुराण, पद्मपुराण, ब्रह्मपुराण, मार्कण्डेय पुराण, साम्ब पुराणादि ग्रन्थों में बताया गया है। सूर्य से सम्बंधित स्वतंत्र सूर्य पुराण, सौर पुराणादि अनेक ग्रन्थ हैं। अतिप्राचीन काल से प्रचलित सूर्योपासना के व्रत-षष्ठी, सप्तमी आदि तिथियां, सभी द्वादश संक्रान्तियों एवं रविवार से सम्बद्ध हैं। षष्ठी व्रतों में चैत्र शुक्ल षष्ठी व मार्गशीर्ष शुक्ल षष्ठी को उत्तर-भारत में छठ पूजा मनाया जाता है। चैत्र शुक्ल षष्ठी पर मनाया जानेवाला छठ यमुना छठ या चैती छठ के नाम से जाना जाता है। शास्त्रानुसार यमुना, यम की बहन और सूर्य की पुत्री है। 

    इस संबंध में एक महत्त्वपूर्ण बात ध्यान देने योग्य है कि महाभारत के अनुशासन पर्व के अनुसार सरोवर खुदवाने से सूर्यदेव प्रसन्न होते हैं। यही कारण है कि देश में सहस्त्रों तालाब सूरजकुंड के नाम से जाने जाते हैं और अधिकांश जगहों पर इस तालाब के किनारे सूर्य मंदिर निर्मित हुए। जैसे कोणार्क का सूर्यमंदिर, ग्वालियर का प्राचीन सूर्य मंदिर, मोढेरा का सूर्य मंदिर आदि। सूर्य उपासना के दौरान मनाया जाने वाला छठ का संबंध भी इस तालाब के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।

    यह व्रत बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में विशेष रूप से मनाया जाता है। कुछ पुरातत्त्वीय साक्ष्यों के अनुसार सूर्य उपासना का महत्त्वपूर्ण केंद्र बिहार रहा है। सूर्य की प्रारम्भिक मूर्तियाँ बिहार के बोधगया (पहली शताब्दी ईसा पूर्व), अनंत गुंफा (खण्डगिरी, उड़ीसा), लाला भगत (कानपुर, दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व), भाजा (महाराष्ट्र, दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व), आदि जैसे स्थानों से मिली है। इसप्रकार सूर्य पूजा का महत्त्वपूर्ण केंद्र सारण, मुंगेर, नवादा, नालंदा, गया आदि जिला रहा है। गोविन्दपुर (नवादा, बिहार) से प्राप्त शक संवत् 1059 के अभिलेख में मगों को भारत लाने में सांब की भूमिका का वर्णन है। संबंधित क्षेत्र से सूर्य की पालकालीन अनेक प्रतिमाएं पटना के संग्रहालय में देखी जा सकती हैं। इसके अलावा बिहार के बेगूसराय जिले में बरौनी, वीरपुर आदि जगहों से सूर्य के प्रतिमा की प्राप्ति हुई हैं जो बेगूसराय के काशी प्रसाद जायसवाल संग्रहालय में संग्रहीत है।     

पौराणिक कथा 

    ऐसी मान्यता है कि सृष्टि की आदि शक्ति प्रकृति देवी ने स्वयं को कई भागों में विभाजित किया जिसमें छठा भाग ब्रह्म जी की मानस पुत्री और सूर्यदेव की बहन है। पुराणों में इनका नाम माँ कात्यायनी है। शिशु-जन्म के छठे दिन बच्चे की स्वास्थ्य, सफलता और दीर्घायु के निमित्त इसकी पूजा की जाती है। चैत्र शुक्ल षष्ठी को यह व्रत करने के पीछे एक पौराणिक कथा है कि राजा प्रियव्रत और उसकी पत्नी निःसंतान थी और संतान की आकांक्षा रखते थे। महर्षि कश्यप ने उन्हें पुत्र प्राप्ति हेतु यज्ञ करने को कहा। यज्ञ के पश्चात् राजा को एक सुंदर पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, परंतु वह मृत था। इससे राजा और दुखी हुआ और विलाप करने लगा। तभी ब्रह्म की मानस पुत्री षष्ठी अपना परिचय देते हुए आगे कहती है कि मैं संसार के सभी लोगों की रक्षा करती हूँ और निःसंतानों को संतान प्राप्ति का वरदान देती हूँ और फिर मृत शिशु को अपना आशीर्वाद देते हुए उसे जीवित कर देती है। देवी की इस कृपा का अनुगूँज राज्य के कोने-कोने तक पहुँच गया और तब से यह षष्ठी व्रत छठ पूजा के रूप में लोक प्रचलित हो गया।  

व्रत का स्वरूप 

    चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व में शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है। इसकी शुरुआत नहाय-खाय से होती है। दूसरे दिन खरना तीसरे दिन सूर्य को सांध्य-अर्ध्य और अंतिम दिन उदीयमान सूर्य को अर्ध्य देकर व्रत का समापन किया जाता है। व्रत प्रायः घर की महिलाएं अपने पति व बच्चे की शुभकामना के लिए रखती हैं। किसी कारण से महिलाएं यदि नहीं रख पाती हैं तो पुरुष भी रख सकते हैं या परिवार अथवा समाज में किसी व्रत रखने वाले को फल-फूल देकर इसे करने का दायित्व भी सौंपते हैं। पूजन के दौरान प्रयुक्त सामग्री के रूप में व्रत हेतु नई साड़ी, बांस की बड़ी टोकरी, पीतल या बांस का सूप, पकवान के रूप में ठेकुआ, लोटा-थाली, दूध, जल, गन्ना, सेब, संतरा, पान-सुपारी, मिठाई आदि उस ऋतु में मिलने वाले प्रायः सभी फल व सब्जी अर्पण किए जाते हैं। ऐसा लोक विश्वास है कि इस व्रत के करने से व्यक्ति व परिवार की मनोकामनाएं पूर्ण होती है।   

निष्कर्ष 

    इस प्रकार सूर्योपासना से जुड़ा यह छठ पर्व लोक श्रद्धा व विश्वास के साथ सदियों से चला आ रहा है। इस व्रत को पूरी श्रद्धा व निष्ठा से करने करने वालों पर ईश्वरीय कृपा होती है और व्यक्ति की मनोकामनाएं पूर्ण होती है। वैसे भी सूर्य को ऊर्जा का स्रोत माना गया है। इनकी किरणों में रोगनिवारक तत्त्व होते हैं। इसकी उपासना से मानसिक शक्ति एकाग्रता व स्मरण शक्ति में वृद्धि होती है। व्यक्ति के कार्यक्षमता में वृद्धि होती है, जिससे व्यक्ति के मान-सम्मान सामाजिक प्रतिष्ठा में स्वतः वृद्धि हो जाती है।    

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