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पाठ्यक्रम परिचय

भारतीय ज्ञान परम्परा सनातन ज्ञान का स्रोत हैI अर्थात यह प्रत्येक काल में अपनी प्रासंगिकता बनाये रखने में समर्थ हैI इसके पीछे एक बड़ा कारण इसकी अभिव्यक्ति का अनुपम और अद्वितीय प्रयोग है जो आधुनिक विधियों में शायद ही देखने को मिलता हैI शास्त्रों का लेखन, उनकी व्याख्या, विषयों का चयन, विषय को रखने का ढंग, रखे हुए विषय के पक्ष में अथवा विपक्ष में अपने तर्कों का चयन, वाक्य-विन्यास का नियम तथा इससे सम्बंधित सभी विषयों का जितना सुन्दर उपयोग यहाँ किया गया है इसका उदाहरण अन्यत्र नहीं मिलता हैI यदि हमें इन शास्त्रों का अध्ययन करना हो अथवा इनके ऊपर किसी तरह का शोध कार्य करना हो तो हमें उन सभी अंगों के बारे में बारीकी से ज्ञान होना चाहिए जो ज्ञान परम्परा में परिलक्षित होते हैंI हमारी समस्या यह है कि हम शोध के जिन विधियों का उपयोग करते हैं वह तुलनात्मक रूप से बहुत अक्षम है, विशेषरूप से ज्ञान परम्परा के अध्ययन के लिएI यह पाठ्यक्रम भारतीय शोध पद्धति के सामर्थ्य का परिचय कराने के साथ-साथ एक वैकल्पिक शोध विधि का मार्ग भी प्रशस्त करेगाI वैकल्पिक भारतीय शोध-विधि न होने से बहुत बार हम विषय के साथ न्याय नहीं कर पाते हैंI यह पाठ्यक्रम इसी निमित्त समर्पित हैI

महत्वपूर्ण सूचना: यह एक लाईव (सजीव) पाठ्यक्रम है, जहाँ प्रशिक्षक द्वारा ली जाने वाली कक्षा में आपको उपस्थित होना पड़ेगा। एक बार यदि आप इस पाठ्यक्रम में प्रवेश लेते हैं तो निर्धारित समय तथा दिन पर आपकी उपस्थिति अपेक्षित है। क्योंकि यह पाठ्यक्रम हमारी वेबसाईट पर सेल्फ़-पेस्ट पाठ्यक्रम की तरह नहीं है जहाँ आप अपनी सुविधा अनुसार वीडियो कभी भी देख सकते हैं।

 

पाठ्यक्रम सम्बंधित जानकारियां

◙ कुल अवधि: 2 महीने
◙ व्याख्यान अवधि: 60 मिनट
◙ कुल घंटे: 14 घण्टे
◙ व्याख्यान आवृत्ति: सप्ताह में दो बार
◙ व्याख्यान का समय: प्रत्येक सोमवार एवं बुधवार, सुबह 8:00 बजे से 9:00 बजे तक
◙ पाठ्यक्रम आरम्भ की तिथि: 20 फ़रवरी 2023
◙ स्तर: परिचयात्मक
◙ माध्यम: हिंदी/अंग्रेजी दोनों
◙ कोर्स प्लेटफार्म: सेंटर फॉर इंडिक स्टडीज का प्लेटफार्म
◙ समय का निर्धारण छात्रों से विमर्श के बाद तय होगा

 

आप क्या सीखेंगे?

प्रस्तुत पाठ्यक्रम में निम्नलिखित विषय समाहित हैं जो आपके ज्ञान का हिस्सा बनेंगे:

➦इस पाठ्यक्रम में आप भारतीय तर्क प्रणाली के बारे में परिचय प्राप्त करेंगेI
➦इसमें आप ग्रन्थों का उद्देश्य, लक्षण तथा उसकी परीक्षा कैसे करते हैं, यह जान पाएंगेI
➦इसमें जो उपनिषदों में संवाद कीजो विधिरही है उसके बारे में आप जानेंगे, जैसे- श्रवण, मनन, निधिध्यासन
➦इस पाठ्यक्रम का एक अतिमहत्वपूर्ण विषय है- तंत्रयुक्तिI इसकी विस्तार से चर्चा की जाएगीI
➦वाद का परिचय प्राप्त करेंगे तथा क्या वाद की श्रेणी में नहीं आता वह जानेंगे
➦इस पाठ्यक्रम में हम प्रमाणों के बारे में चर्चा करेंगे जिन्हें ज्ञान का माध्यम माना जाता है, जिसमें प्रमुख प्रमाण हैं- प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान, अर्थापत्ति तथा अनुपलब्धि
➦इसमें हम जैन दर्शन के नय-सिद्धांत की चर्चा के साथ-साथ बौद्धों प्रमाण चिन्तन पर भी विचार करेंगेI
➦मीमांसा ग्रंथों में उल्लेखित ‘व्याख्या के नियमों’ पर प्रकाश भी इस पाठ्यक्रम में डाला जायेगाI

 

पाठ्यक्रम के लाभ

↣इस पाठ्यक्रम का सबसे बड़ा लाभ यह है कि आप प्राचीन ज्ञान के आधार से परिचित होंगे
↣इसमें आपको व्याख्यान के अलावा अपने प्रश्न रखने तथा विषय पर बातचीत का अवसर मिलेगा
↣इसमें कुछ व्याख्यान विषय के वरिष्ठ विशेषज्ञों द्वारा लिए जायेंगे तथा उनसे विमर्श का अवसर मिलेगा
↣इसमें आपको संदर्भग्रन्थ तथा कुछ अन्य लेखों के लिंक आपको प्रदान किये जायेंगे जो आपकी इस ज्ञान यात्रा को और सुदृढ़ करेंगे
↣पाठ्यक्रम समाप्ति के बाद आपको इंडस विश्वविद्यालय की ओर से ‘प्रमाणपत्र’ प्रदान किया जायेगाI

 


धनवापसी नीति (Refund Policy): चूंकि ये पाठ्यक्रम रियायती दरों पर उपलब्ध हैं, एक बार पाठ्यक्रम के लिए नामांकन करने के बाद धनवापसी का कोई प्रावधान नहीं है। यदि आप किसी अप्रत्याशित परिस्थिति के कारण पाठ्यक्रम में भाग लेने में सक्षम नहीं हैं, तो हम आपको मूल रूप से नामांकित पाठ्यक्रम के बदले में एक अलग पाठ्यक्रम में समायोजित कर सकते हैं।


 

Course Curriculum

अध्याय १: भारतीय शोध विधि की विशेषताएँ तथा महत्व
अध्याय २: ग्रंथ निर्माण तथा व्याख्या का भारतीय चिन्तन: उद्देश्य, लक्षण तथा परीक्षा
अध्याय ३: तन्त्रयुक्ति: वाक्यनिर्माण तथा वाक्यशुद्धि के नियम
अध्याय ४: तन्त्रदोष: वाक्य-विन्यास के दोष
अध्याय ५: तन्त्रगुण: वाक्य-विन्यास के गुण
अध्याय ६: व्याख्या के नियम: मीमांसा तथा अन्य दर्शन
अध्याय ७: ज्ञान के साधन तथा इनका परीक्षण: प्रमाण (प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान, अर्थापत्ति, अनुपलब्धि)
अध्याय ८: ज्ञान के अन्य साधन: प्रतिभ, युक्ति, प्रसंग, नय
अध्याय ९: संवाद का महत्व तथा विधियाँ
अध्याय १०: उपनिषदीय संवाद की प्रविधि तथा श्रवण मनन निदिध्यासन
अध्याय ११: वाद परम्परा तथा उसकी विशिष्टतायें
अध्याय १२: शास्त्र समझने की पद्धति के रूप में भाष्य, टीका, वृत्ति, दीपिका इत्यादि पद्धतियों का प्रयोग
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