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How Indian Philosophy transcends Logic and Morality

In this extract from his classic work, M.Hiriyanna explains that Indian philosophical tradition is not restricted to intellectual and moral teachings. Rather, it includes and transcends them.

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Does Revelation contradict Reason? An Indic Perspective

This extract from M.Hirayanna's classic work elaborates on the relation between reason and revelation as described in Indian philosophical traditions.

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Brahmins are the root cause of all problems !

British officials conveniently blamed the Brahmin soldiers for instigating the mutiny of 1857. But in doing so, they were faced with an even bigger predicament.

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Centre for Indic Studies is Hiring

Dec 8,20by admin

Centre for Indic Studies (CIS) invites applications for the position of Research Associate.

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Oral Tradition and the AIT

The Jews indeed wandered about for many centuries in the Near East, from the time when Abraham and his clan left Ur, c1900 BC (if all this is historically true; opinions are divided for and against); until they finally settled in Judea; so their scriptures tell us. (But note here that Ur in Mesopotamia had literary for 1000 years earlier, so the Jews Probably have had it also.) Not so the RV; in the hymns there is not even a hint of this hypothetical travel and its (mis-) adventures. We can therefore forget this empty argument.

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Evolution cannot explain the origin of Language

When Sanskrit appeared in the hymns of the RV, it was already a fully developed and highly complex language – but one already suffering attritions and changes (i.e. devolving to simpler forms). Ancient Egyptian too appeared more or less suddenly c 3000 B.C. as a fully developed language = it too having recognizable roots (Gardiner 1957; Watterson 1993).....It is therefore difficult to see how or why languages started with animal hisses, grunts and warbles, then became very complex media of thought and communication and then, despite literacy which should have preserved the older forms more easily, they devolved into much simpler forms.

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उदीयमान राष्ट्रदृष्टि – 5

इस्लाम द्वारा हाँकी जाने वाली एकेश्वरवाद की डींग को ही ले लीजिए। यह एक बहुत ही बीभत्स विचार है। यह एक आध्यात्मिक विचार बिल्कुल नहीं है। इस विचार के अनुसार ईश्वर सृष्टि से बाहर है और सृष्टि में कुछ भी ऐसा नहीं जिसमें ईश्वरीयता का समावेश हो। यह एक मनगढ़न्त मीमांसा है, केवल बुद्धि की उछल-कूद है। फिर भी हम बहुत दिन से यह सिद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं कि हम भी एकेश्वरवादी हैं। एकेश्वरवाद के इस ढकोसले को बुद्धि की डींग समझ कर एक ओर ढकेलने के लिए यह आवश्यक है कि हम सनातन धर्म को हृदयंगम करें और इस्लाम के मतवाद को जानें।

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उदीयमान राष्ट्रदृष्टि – 4

हिन्दू संस्कृति ही भारतवर्ष की राष्ट्रीय संस्कृति है। सनातन धर्म की यह संस्कृति एक विराट तथा बहुमुखी संस्कृति है। किन्तु साथ ही साथ यह एक ऐसी संस्कृति है जो मानवजाति के लिए स्वभाव-सुलभ है। इस संस्कृति में ऐसा कुछ भी नहीं जिसे कृत्रिम कहा जा सके, जिसका निर्माण मनुष्य के बाह्य मानस द्वारा हुआ हो, और जिसको ईसाइयत, इस्लाम तथा कम्युनिज्म की संस्कृतियों की नाईं बलात् लादा गया हो। अतएव ऐसी प्रत्येक संस्कृति को जो हिन्दू संस्कृति के अनुकूल न हो, जो सनातन धर्म की संस्कृति के साथ मेल न खाती हो, भारतवर्ष से भागना पड़ेगा।

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उदीयमान राष्ट्रदृष्टि – 3

यह लेख सीता राम जी द्वारा दिए गए एक भाषण का तीसरा भाग है| इसमें श्री सीता राम जी कहते हैं कि सेकुलरवाद को भारत में केवल हिन्दू समाज पर थोपा जाता है| यह समझाते हुए वे कहते हैं कि सेकुलरवाद का जन्म इसाइयत की पृष्ठभूमि में हुआ और उसका भारत के समाज में और हिन्दू धर्म के बीच कोई औचित्य नहीं है| इस विचारधारा को यहाँ पर थोपा कैसे हमारी सामाजिक व्यवस्था को ठेस पहुंचाता है इसको जानने के लिए पढ़िए|

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उदीयमान राष्ट्रदृष्टि – 2

इस लेख में श्री सीता राम गोएल कहते हैं कि भारतवर्ष का इतिहास वस्तुतः हिन्दू समाज का इतिहास है, हिन्दू संस्कृति का इतिहास है, हिन्दू अध्यात्म-साधना का इतिहास है। वह इतिहास बाह्य आक्रमणकारियों का इतिहास बिल्कुल नहीं है, जैसा कि हमें आजकल पढ़ाया जा रहा है।

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Centre For Indic studies
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