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Dharma

तंत्र ३ – आगम : शिव पार्वती का संवाद

आगम उपदिष्ट हैं – अर्थात शिव और पार्वती के संवाद के रूप में हैं| काव्य के ग्रंथों में आचार्य अभिनव गुप्त ने जब सहृदय की परिभाषा दी अपनी टीका में, तो इसी को हृदय संवाद कहा| अर्थात शिव और पार्वती का संवाद कोई दो व्यक्तियों के बीच का संवाद नहीं है| यह संवाद है हृदय का| हृदय का ही एक पक्ष प्रश्न करता है| दूसरा उसको समझता है, उत्तर देता है| इस तरह का एक एकत्व का संवाद है यह|

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तंत्र २ – तंत्र की अवधारणा

इस लेख में डॉ. रजनीश मिश्र ने तंत्र की अवधारणा को समझाने का प्रयत्न किया है| वे बताते हैं कि तंत्र एक साधना पद्धति है और ज्ञान के उपार्जन की एक पद्धति है| तंत्र और आगम कैसे सभी प्रान्तों और काल खण्डों में प्रचलित रहे हैं यह भी हमें इस लेख से पता चलता है|

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तंत्र १ : भारत – एक आध्यात्मिक संस्कृति

इस लेख माला के पहले लेख में डॉ. रजनीश मिश्र तुलना करते हैं तीन महान संस्कृतियों की और यह बताते हैं कि भारतीय संस्कृति की विशेषता क्या है और क्यों उसे एक ज्ञान संस्कृति के रूप में ही सदैव देखा जाता रहा है। इसके पश्चात वो आगम और निगम ग्रंथों की संक्षिप्त परिभाषा देते हुए परा और अपरा विद्याओं के बारे में बताते हैं। यह लेख माला तंत्र पर है और इस लेख में एक पृष्ठभूमि देकर लेखक आगे तंत्र के बारे में विस्तार करेंगे।

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The Book I Would Pass To My Children

The Book I would pass to my children would contain no sermons, no shoulds and oughts. Genuine love comes from knowledge, not from a sense of duty or guilt. How would you like to be an invalid mother with a daughter who can't marry because she feels she ought to look after you, and therefore hates you? My wish would be to tell, not how things ought to be, but how they are, and how and why we ignore them as they are. You cannot teach an ego to be anything but egotistic, even though egos have the subtlest ways of pretending to be reformed. The basic thing is therefore to dispel, by experiment and experience, the illusion of oneself as a separate ego. The consequences may not be behavior along the lines of conventional morality.

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7 Ganeshas from 7 Temples Across India

In this article, Pankaj Saxena discusses seven most exquisite vigrahas of Ganesha, all across the country, through six states and seven temples. The article also discusses the history of these temples and places.

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Agenda for Hindu Survival: What we can do as individuals

While preservation is a long-term agenda and a continuous process that cannot be ignored, what is immediate and a matter of our survival is the protection of our civilization by countering and nullifying the challenges being posed by inimical forces of Adharma.

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ईसाई मिशनरी और जाति-संस्था

सन् १८५७ के पूर्व का विशाल मिशनरी साहित्य एवं पत्र-व्यवहार धर्मांतरण के मार्ग में दो ही बाधाओं का उल्लेख करता है। एक, जाति-संस्था के कड़े बंधन, जिसके कारण धर्मांतरित व्यक्ति जाति से बहिष्कृत कर दिया जाता था। दूसरा कारण था पूरे समाज में ब्राह्मणों के प्रति अपार श्रद्धा का भाव। ब्राह्मणों की नैतिक-बौद्धिक श्रेष्ठता को चुनौती दे पाने में मिशनरी स्वयं को असमर्थ पा रहे थे। अपने इस अनुभव के कारण ईसाई मिशनरियों ने जाति-संस्था को ब्राह्मणवाद की रचना मानकर उसे तोड़ना ही ईसाई धर्म का मुख्य लक्ष्य घोषित कर दिया।

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And Shri Rama Returns to Ayodhya!

Today on 5th August 2020, after hundreds of years, Shri Rama is coming back to Ayodhya. After the sacrifice of millions of Hindus, this generation is lucky enough to see the Grand Rama Temple built at Ayodhya. This is a story of how this happened. Jai Shri Rama.

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Ayodhya: The Concept of the Sacred Kshetra

While Hindus, recognize Valmiki’s Ramayana as a text of Itihasa, the Indian conception of the past with its foundation in cyclical time and pedagogical form, has no parallel to the modern secular concept of unidirectional positivistic historicism.

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जाति-विहीन समाज का सपना

क्या अपने लंबे अनुभव के प्रकाश में यह आवश्यक नहीं कि हम नए सिरे से जाति-संस्था को समझने का प्रयास करें? क्यों यह जाति-संस्था समूचे विश्व में केवल भारत और विशेषकर हिंदू समाज का ही वैशिष्ट्य है? भारतीय मिट्टी और इतिहास में इसकी जड़ें कहाँ हैं? यदि इसके पीछे कोई जीवन-दर्शन है तो वह क्या है? यदि यह मानव-विरोधी, काल-बाह्य और अप्रासंगिक संस्था है तो यह अपने आप मर क्यों नहीं जाती? क्या है जो इसे जिंदा रखे हुए है? पर इन सब प्रश्नों में प्रवेश करने के पूर्व आवश्यक है कि हम यह जानें कि यूरोपीय यात्रियों, मिशनरियों, ब्रिटिश शासकों इत्यादि ने जाति-संस्था को समय-समय पर किस रूप में देखा और उसके प्रति क्या रणनीति अपनाई?

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Centre For Indic studies
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