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All posts by Dr. Vikas Singh

सर जे.सी. बोस के जीवन का वैज्ञानिक मूल्यांकन

अपने शोध करियर के पहले चरण में, बोस ने भौतिकी के क्षेत्र में काम किया, जो कि केवल छह साल तक ही चला। 1900-1901 में, उन्होंने भौतिक विज्ञान से शरीर क्रिया विज्ञान, विशेष रूप से पादप शरीर क्रिया विज्ञान में एक तीव्र परिवर्तन किया, वे लगभग सैंतीस वर्षों तक अपने शेष जीवन के लिए पादप शरीर क्रिया विज्ञान पर कार्य करते रहे।

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अब्राहमिक दृष्टि में वनस्पति जगत

दर्जनों महान विचारकों ने पौधों की बुद्धि केसिद्धांत दिए और उनकादस्तावेजीकरण किया है। फिर भी यह विश्वास कि पौधे अकशेरूकीय की तुलना में कम बुद्धिमान और विकसित प्राणी हैं, और यह कि "विकासवादी पैमाने" पर वे बमुश्किल निर्जीव वस्तुओं से ऊपर हैं, यह सोच हर जगह मानव संस्कृतियों में बनी रहती हैं और हमारे दैनिक व्यवहार में प्रकट होती है।

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भारतीय दार्शनिक दृष्टि में समय का विचार

समय एक रेखीय, एकल-दिशात्मक गति नहीं है, जैसे कि एक तीर अतीत से भविष्य की ओर गति करता है। यह "हमारी यांत्रिक दुनिया के एक सुविधाजनक भ्रम से ज्यादा कुछ नहीं है, जो एक जीवंत समय को एक फ्रैक्टल के आंतरिक कर्लिंग विवरण के साथ जोड़ता है।" जब हम अनंत काल की वक्रता में प्रवेश करते हैं, तो हम जीवन की सच्ची आंतरिक लय की परिपूर्णता का अनुभव करते हैं।

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द्वैत और अद्वैतवाद के मध्य दार्शनिक संवाद

भारत में द्वैतवाद का इतिहास काफी पुराना है । वेदों में इसकी आंशिक झलक भी प्राप्त होती है किन्तु व्यवस्थित रूप से सांख्य सूत्रों के रूप में यह स्थापित होता है ।द्वैतवाद में जीव, जगत्, तथा ब्रह्म को परस्पर भिन्न माना जाता है।

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नाट्यशास्त्र का सामान्य परिचय

चतुर्विध अभिनय के सहायक नृत्य, गीत, वाद्य एवं गति, वृत्ति, प्रवृत्ति और आसन का अनुसंधान भी नाट्य के अंतर्गत है। इस प्रकार अभिनय के विविध अंग एवं उपांगों के स्वरूप और प्रयोग के आकारप्रकार का विवरण प्रस्तुत कर तत्संबंधी नियम तथा व्यवहार को निर्धारित करनेवाला शास्त्र 'नाट्यशास्त्र' है।

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अद्वैत वेदांत द्वारा विश्व की समस्याओ का परिहार

चूंकि दर्शनशास्त्र विषय की प्रकृति बहुआयामी होती है अतः इस बात को कहने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि दर्शनशास्त्र के अन्तर्गत जो अवधारणाएं हमें परिलक्षित होती है, उनकी भी प्रकृति बहुआयामी ही होगी।    यह सभ्यता बोध मनुष्य का मनुष्य से, मनुष्य का प्रकृति से मनुष्य का ईश्वर से द्वैतभाव नहीं रखता है। हमारी सभ्यता अद्वैतबोध के आधार पर निर्मित है।

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प्राणायाम परिचय –योग ग्रंथो के आलोक में

प्राणायाम मन पर नियंत्रण, मानसिक स्थिरता शांति तथा एकाग्रता विकसित करने की पद्धति है। प्राणायाम से शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक शक्ति का विकास करना संभव होता है।

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‘‘माया एक अद्भुत पहेली‘‘ 

कई विद्वान यह कहते है कि आचार्य शंकर जगत के अस्तित्व को नहीं मानते किन्तु आचार्य इस जगत के अस्तित्व को नकारते नहीं है बल्कि इसे वे व्यवहारिक सत्ता की कोटि में रखते है क्योंकि जगत को नकारने का अर्थ होता कि उनका सारा उपदेश, भाष्य यहां तक की उनका सिद्धान्त भी व्यर्थ होता।

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फ्री-विल – एक पुस्तक समीक्षा

सात अध्यायों वाली यह पुस्तक मुक्त इच्छा, इच्छा की अवचेतन उत्पत्ति,बदलते हुए विषय, ”चुनाव प्रयास,भावनाए” ,क्या सत्य हमारे लिए बुरा होगा ,नैतिक जिम्मेदारियाँ,राजनीति और निष्कर्ष नामक अध्यायों में बटी है|

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न्याय शास्त्र में संवाद के दोषो के परिहार की प्रविधि(मेथड)

जिसकी सहायता से किसी सिद्धान्त पर पहुँचा जा सके उसे न्याय कहते हैं-प्रमाणों के आधार पर किसी निर्णय पर पहुँचना ही न्याय है। यह मुख्य रूप से तर्कशास्त्र और ज्ञानमीमांसा है।

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