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All posts by Dr. Vikas Singh

अद्वैत वेदांत द्वारा विश्व की समस्याओ का परिहार

चूंकि दर्शनशास्त्र विषय की प्रकृति बहुआयामी होती है अतः इस बात को कहने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि दर्शनशास्त्र के अन्तर्गत जो अवधारणाएं हमें परिलक्षित होती है, उनकी भी प्रकृति बहुआयामी ही होगी।    यह सभ्यता बोध मनुष्य का मनुष्य से, मनुष्य का प्रकृति से मनुष्य का ईश्वर से द्वैतभाव नहीं रखता है। हमारी सभ्यता अद्वैतबोध के आधार पर निर्मित है।

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प्राणायाम परिचय –योग ग्रंथो के आलोक में

प्राणायाम मन पर नियंत्रण, मानसिक स्थिरता शांति तथा एकाग्रता विकसित करने की पद्धति है। प्राणायाम से शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक शक्ति का विकास करना संभव होता है।

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‘‘माया एक अद्भुत पहेली‘‘ 

कई विद्वान यह कहते है कि आचार्य शंकर जगत के अस्तित्व को नहीं मानते किन्तु आचार्य इस जगत के अस्तित्व को नकारते नहीं है बल्कि इसे वे व्यवहारिक सत्ता की कोटि में रखते है क्योंकि जगत को नकारने का अर्थ होता कि उनका सारा उपदेश, भाष्य यहां तक की उनका सिद्धान्त भी व्यर्थ होता।

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फ्री-विल – एक पुस्तक समीक्षा

सात अध्यायों वाली यह पुस्तक मुक्त इच्छा, इच्छा की अवचेतन उत्पत्ति,बदलते हुए विषय, ”चुनाव प्रयास,भावनाए” ,क्या सत्य हमारे लिए बुरा होगा ,नैतिक जिम्मेदारियाँ,राजनीति और निष्कर्ष नामक अध्यायों में बटी है|

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न्याय शास्त्र में संवाद के दोषो के परिहार की प्रविधि(मेथड)

जिसकी सहायता से किसी सिद्धान्त पर पहुँचा जा सके उसे न्याय कहते हैं-प्रमाणों के आधार पर किसी निर्णय पर पहुँचना ही न्याय है। यह मुख्य रूप से तर्कशास्त्र और ज्ञानमीमांसा है।

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Centre For Indic studies
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