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All posts by Sita Ram Goel

उदीयमान राष्ट्रदृष्टि – 5

इस्लाम द्वारा हाँकी जाने वाली एकेश्वरवाद की डींग को ही ले लीजिए। यह एक बहुत ही बीभत्स विचार है। यह एक आध्यात्मिक विचार बिल्कुल नहीं है। इस विचार के अनुसार ईश्वर सृष्टि से बाहर है और सृष्टि में कुछ भी ऐसा नहीं जिसमें ईश्वरीयता का समावेश हो। यह एक मनगढ़न्त मीमांसा है, केवल बुद्धि की उछल-कूद है। फिर भी हम बहुत दिन से यह सिद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं कि हम भी एकेश्वरवादी हैं। एकेश्वरवाद के इस ढकोसले को बुद्धि की डींग समझ कर एक ओर ढकेलने के लिए यह आवश्यक है कि हम सनातन धर्म को हृदयंगम करें और इस्लाम के मतवाद को जानें।

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उदीयमान राष्ट्रदृष्टि – 4

हिन्दू संस्कृति ही भारतवर्ष की राष्ट्रीय संस्कृति है। सनातन धर्म की यह संस्कृति एक विराट तथा बहुमुखी संस्कृति है। किन्तु साथ ही साथ यह एक ऐसी संस्कृति है जो मानवजाति के लिए स्वभाव-सुलभ है। इस संस्कृति में ऐसा कुछ भी नहीं जिसे कृत्रिम कहा जा सके, जिसका निर्माण मनुष्य के बाह्य मानस द्वारा हुआ हो, और जिसको ईसाइयत, इस्लाम तथा कम्युनिज्म की संस्कृतियों की नाईं बलात् लादा गया हो। अतएव ऐसी प्रत्येक संस्कृति को जो हिन्दू संस्कृति के अनुकूल न हो, जो सनातन धर्म की संस्कृति के साथ मेल न खाती हो, भारतवर्ष से भागना पड़ेगा।

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उदीयमान राष्ट्रदृष्टि – 3

यह लेख सीता राम जी द्वारा दिए गए एक भाषण का तीसरा भाग है| इसमें श्री सीता राम जी कहते हैं कि सेकुलरवाद को भारत में केवल हिन्दू समाज पर थोपा जाता है| यह समझाते हुए वे कहते हैं कि सेकुलरवाद का जन्म इसाइयत की पृष्ठभूमि में हुआ और उसका भारत के समाज में और हिन्दू धर्म के बीच कोई औचित्य नहीं है| इस विचारधारा को यहाँ पर थोपा कैसे हमारी सामाजिक व्यवस्था को ठेस पहुंचाता है इसको जानने के लिए पढ़िए|

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उदीयमान राष्ट्रदृष्टि – 2

इस लेख में श्री सीता राम गोएल कहते हैं कि भारतवर्ष का इतिहास वस्तुतः हिन्दू समाज का इतिहास है, हिन्दू संस्कृति का इतिहास है, हिन्दू अध्यात्म-साधना का इतिहास है। वह इतिहास बाह्य आक्रमणकारियों का इतिहास बिल्कुल नहीं है, जैसा कि हमें आजकल पढ़ाया जा रहा है।

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उदीयमान राष्ट्रदृष्टि – 1

सीता राम जी इस भाषण में बंगाल की स्थिति का विवरण दे रहे हैं जो कि उसके साम्यवाद को अपनाने के बाद हो गयी है| यह भाषण अब प्रकाशन में नहीं है परन्तु बहुत ही महत्त्वपूर्ण है और इंडिक वार्ता पर इसका प्रकाशन श्रंखला में होगा| श्रंखला में पांच लेखों की कड़ी होगी|

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संघ, सीता राम गोएल और जय प्रकाश नारायण – PIPL 1

यह लेख वरिष्ठ इतिहासकार सीता राम गोएल की पुस्तक 'Perversion of India's Political Parlance' के अनुवाद का पहला भाग है| इस लेख में श्री सीता राम जी जे. पी. के संघ के साथ पहली भेंट का वर्णन कर रहे हैं| यह पूरी पुस्तक लेखों की एक श्रंखला में प्रस्तुत की जायेगी Indic Varta पर| पढ़ते रहें|

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Perversion of India’s Political Parlance

Who is a 'leftist' or 'rightist' or who is 'secular' and who is 'communal'? In this article, Sita Ram Goel deconstructs the political and academic jargon. In doing so, he explains how language is used as a political weapon. This article is a must read.

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The Tabligh Movement or Millions of Bearded Militants on the March – 2

Apr 7,20by Sita Ram Goel

In this follow up of the earlier article, Shri Sita Ram Goel goes to history to trace the evolution of Tablighi Jamaat. He argues that its origin and inspiration are not modern. The urges that fire Jamaatis were present even in the times of the Mughal Empire and even before that. These urges lie at the very heart of Islam.

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The Tabligh Movement or Millions of Bearded Militants on the March – 1

In this brilliant expose of Tablighi Jamaat, India's finest historian Sita Ram Goel proves that Tablighi Jamaat is not a social movement. It has no peaceful intentions and it has no spiritual or philosophical bent. Like all Islamic movements it is also a militant movement, with violent goals and genocidal intentions about the non-Muslim groups at its target, the most visible of the enemies, being the Hindus. In light of this two-part series, the current deeds of Tablighi Jamaat do not constitute outlier behavior, but is symptomatic of the core ideology of Tablighi Jamaat.

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Idealism vs. Dialectical Materialism – A Cold War – 2

In this short piece, Sita Ram Goel continues with his exposition on Communism. He tells what the major faults of communism are and how a spiritual outlook can help diffuse the spectre of communism. These two articles, taken from the brilliant work "Genesis and Growth of Nehruism"are still relevant in view of the dominance of the left-liberals.

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Centre For Indic studies
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