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भारतीय मूल चिन्तन में राजनीति तथा दंडनीति

July 17, 2022 Authored by: Dr. Amit Kumar Dubey

वर्तमान में प्राचीन भारतीय राजनीतिक व्यवस्था के बारे में अनेक भ्रांतियां हैंI इसमें सबसे बड़ी भ्रान्ति हिन्दुओं की दंड व्यवस्था को लेकर हैI ऐसी एक धारणा बना दी गयी है कि हिन्दू राजनीति और कूटनीति से अनभिज्ञ थे तथा अपने राष्ट्र के रक्षा की चिंता नहीं करते थेI वस्तुतः मैं अपनेइस लेख में विशुद्ध भारतीय राजनीति के ग्रंथों में वर्णित राजनीति के बारे में चर्चा करूँगाIहम यह समझने की कोशिश करेंगे कि अर्थशास्त्र, कामान्दक नीतिसार, महाभारत, रामायण आदि ग्रंथो में वर्णित राजनीति तथा राजा के कर्तव्य, उसकी धर्म-परायणता, हिन्दू होना नहीं हैI क्या हिन्दू शासक होने का अर्थ दंड-नीति से दूर रहना, राष्ट्र की रक्षा न करना, बुद्धिहीन होना है? इस आक्षेप का उत्तर हम अपने राजनीति शास्त्रों से ही देने का प्रयास कर रहे हैंIसनातन परम्परा में नीतिशास्त्र का अतुलनीय स्थान है क्योंकि नीति के अनुसार आचरण करके मनुष्य किसी भी पद को प्राप्त कर सकता हैI हमारे इतिहास में ऐसे उदाहरण भी बहुत हैं कि नीति पर अडिग व्यक्ति को देवतुल्य पद मिला हैI मान्यता है कि सृष्टि के समय ब्रह्मा जी ने जिस नीतिशास्त्र का प्रतिपादन किया उसे भगवान शंकर ने ग्रहण कर संक्षिप्त भी कर दियाI उसी संक्षिप्त नीतिशास्त्र को देवराज इंद्र ने ग्रहण कर संक्षिप्त कर दियाI इसी से आचार्य बृहस्पति और शुक्र ने संक्षिप्त करके आम मनुष्यों के लिए उपलब्ध करायाI इसमें प्रत्येक तरह की नीतियों का सविस्तार वर्णन है किन्तु यहाँ मैं राजा तथा राज्य से सम्बंधित नीतियों की चर्चा करूँगाIप्राचीन भारत में शासन कला को भिन्न-भिन्न शब्दों से संबोधित किया जाता था, जैसे राजधर्म, दंडनीति, नीतिशास्त्र, अर्थशास्त्रI प्रारम्भ में इसे राजधर्म की संज्ञा दी गई थी लेकिन अनेक ग्रंथों में दंडनीति शब्द के संकेत के लिए पर्याप्त उपलब्ध विवरण हैं जो राजधर्म का वर्णन करते हैंI बाद में शासन कला के क्षेत्र में सबसे प्रचलित शब्द ‘अर्थशास्त्र’ हुआI

भारतीय राजनीति, दंडनीति या राजधर्म पर सभी लेखकों का यही विचार रहा है कि राजा को आत्म-नियंत्रण प्राप्त करना चाहिएI अपने अंगों पर आत्म-नियंत्रण प्राप्त राजा ही सफलतापूर्वक शासन कर सकता हैI अन्यथा वह दोषों से व्याप्त होकर घिर जायेगा और अपने विरोधियों के लिए दुर्बल हो जायेगाI इसलिए उसे अपने शरीर और मानस पर नियंत्रण पाने के लिए सभी उपाय करने चाहिएI

जितेन्द्रियो ही शक्नोति वशे स्थाययितुम प्रजा

आत्मा जेय: सदा राजा ततो जेयाश्च शत्रव:

अजितात्मा नरपतिर्विजेयेत कथं रिपून

एकस्य हि योशक्तो मनस: सन्निवर्हने

महीं सागरपर्यन्ताम सकथं द्यवजेष्टिII

भारतीय मान्यताओं के अनुसार जिसमें धर्म विचरता है, वही राजा है, क्योंकि राजा धर्म का पालन करने तथा प्रजा से धर्म का पालन कराने के लिए ही होता हैIमहाभारत महाकाव्य में राजा के लिए विभिन्न पर्यायवाची सम्बोधन प्राप्त होते हैं जो राजा के विराट स्वरुप एवम् राज-कर्तव्यों का द्योतक है:

राजा भोजो विराट सम्राट क्षत्रियो भूपतिरनृप:

य एभि: स्तूयते शब्दै: कस्तं नार्चितुमर्हतीII (महाभारत, शांतिपर्व, अध्याय 68 श्लोक 54)

महाभारत कहता है कि राजा समस्त प्रजाओं की सावयव प्रस्तुति हैI वह प्रजा का प्रथम अथवा प्रधान शरीर हैI प्रजा भी राजा का अनुपम एवं अप्रतिम शारीरिक स्वरुप हैI राजा के बिना कोई देश और वहां के निवासी नहीं रह सकते और देशवासियों के बिना राजा नहीं रह सकते हैंI राजा प्रजा का गुरुतर हृदय, गति, प्रतिष्ठा और उत्तम सुख हैI हे नरेन्द्र! राजा का आश्रय लेने वाले मनुष्य इस लोक और परलोक दोनों पर पूर्ण विजय प्राप्त कर लेते हैंI

राजा प्रजानां प्रथम शरीरं, प्रजाश्च राज्ञोअप्रतिम शरीरंI

राज्ञा विहीना न भवन्ति देशा, देशैर्विहिना न नृपा: भवन्तिII

राजा प्रजानां हृदयं गरियो, गति: प्रतिष्ठा सुखमुत्तम चI

समाश्रिता लोकमिमम परं च, जयन्ति सम्यक पुरुषा: नरेन्द्रII (महाभारत, शांतिपर्व)

राजा को सप्तांग की रक्षा के दायित्व को बताते हुए कहते हैं कि हे कुरुनन्दन! राजा को उचित है कि वह सात तत्वों की अवश्य रक्षा करेI वे सात हैं- राजा को स्वत्व, मंत्री, कोश, दण्ड(सेना), मित्र, राष्ट्र और नगर ये राज्य के सात अंग हैंI राजा को इन सभी सातों का प्रयत्नपूर्वक पालन करना चाहिए I

राजा सप्तैव रक्ष्याणी तानि चैव निबोध मेI

आत्मामात्याश्च कोशाश्च डंडो मित्राणि चैव हिII

तथा जनपदाश्चैव पुरं च कुरुनन्दनI

एतत सप्तामकम राज्यं परिपाल्यम प्रयत्नतःII (महाभारत, शांतिपर्व, अध्याय 69)

राजा के द्वारा प्रजा के प्रति धर्मानुकूल व्यवहार का अनुपालन राजा को सुखद पुण्य एवम् चिरस्थायी यश प्राप्त कराता हैI इसलिए कहा गया है कि जिस राजा के द्वारा धर्म का सत्कार किया जाता है उसका सर्वत्र आदर होने लगता है क्योंकि राजा जो-जो कार्य करता है, प्रजा भी राजा की अनुगामी होती है और प्रजा को वही कार्य करना श्रेष्ठ लगने लगता हैI

राज्ञा हि पूजितो धर्मस्तत: सर्वत्र पूज्यतेI

यद् यदाचरते राजा तत प्रजानां स्म रोचतेII (शांतिपर्व, अध्याय 75)

दंड के संतुलन का महत्व शास्त्रों में रेखांकित किया गया हैI भलिभांति दण्ड धारण करने वाला राजा सदा धर्म का भागी होता हैI निरंतर दण्ड धारण किये रहना राजा के लिए उत्तम धर्म माना गया है I ऐसी ही आचरण पर राजा की प्रशंसा की जाती हैI

सम्यग्दंदघरो नित्यं राजा धर्ममवाप्नुयातI

नृपस्य सततं दंड: सम्यग धर्म:प्रशस्यतेII (शांतिपर्व, अध्याय 69)

आचार्य कौटिल्य का तो स्पष्ट मानना है कि ‘सुखस्य मूलं धर्म:’ अर्थात जिसे परमसुख की अभिलाषा हो वह धर्मनीति का पालन करेI राजा तथा राज्य के लिए सूत्रात्मक उपदेश में वे कहते हैं – ‘राज्यमूलमिन्द्रीयजय:’ अर्थात राजा और राज्य का मूल है इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करनाI धर्म के मार्ग चलकरइन्द्रिय विजय संभव हैI कौटिल्य कहते हैं कि राजा के कर्मण्य होने पर राजकर्मचारीभी कर्मण्य रहते हैं और उसके प्रमादी होने पर वे भी प्रमादी हो जाते हैंI अपनी नीति में कौटिल्य कहते हैं कि राजा को दिन तथा रात को आठ भागों में बांटकर ही कार्य करना चाहिएI जिसकेकुछ हिस्से का जिक्र हम यहाँ करेंगे जैसे- दिन के पहले हिस्से में राष्ट्र-रक्षा का प्रबंध तथा आय व्यय विषयक बातें सुने, दूसरे भाग में नागरिको तथा ग्रामीणों के कार्योंका निरीक्षण करें, तीसरे भाग में स्नान तथा भोजन और स्वाध्याय, चौथे भाग में उपहार आदि लेना, पांचवे भाग में मंत्रिपरिषद को बुलाना तथा ख़ुफ़िया लोगों से गुप्त बातें सुनना , छठे भाग में स्वच्छंद विहार करे या सलाह करना, सातवे भाग मेंहाथी, घोडा, रथ तथा पदातियों की देख रेख, आठवें भाग में सेनापति के साथ सैनिक कार्य तथा आक्रमण संबंधी विचारकरे , आठवे भाग में सेनापति के साथ सैनिक कार्य तथा आक्रमण संबंधी विचार करे तथा दिन के समाप्त होने पर संध्याकरेI यह पूरी प्रक्रिया सिर्फ दिन के लिए है ऐसे ही रात को आठ भागों में बांटकर राजा को कार्य करना थाI इसी तरह से रात के आठवे हिस्से अर्थात भोर बेला में राजा को चाहिए कि ऋत्विग आचार्य तथा पुरोहित लोगों के साथ स्वस्त्ययन (वेदमंत्र-विशेष) का पाठ करे I वैद्य, पाचक तथा ज्योतिषियों के साथ बात-चित करेI बछड़े सहित गो-बैल की प्रदक्षिणा कर राजदरबार में जायेI

वरं न राज्यं न कुराजराज्यं, वरं न मित्रं न कुमित्रमित्रंI

वरं न शिष्यों न कुशिष्यशिष्यो, वरं न दारा न कुदारदाराII (चा. नी. द. 6/13)

इसमें आचार्य कहते हैं कि राजा का न होना अच्छा है किन्तु बुरे राजा का होना अच्छा नहींI मित्र का न होना अच्छा है किन्तु कुमित्र का होना अच्छा नहींI शिष्य न हो तो अच्छा, किन्तु निन्दित शिष्य का होना अच्छा नहींI पत्नी न हो तो अच्छा है, किन्तु कुदारा (व्यभिचारिणी) का होना अच्छा नहींIअर्थात राजा का अच्छा होना इतना महत्वपूर्ण है जितना कि मनुष्य की अपनी व्यक्तिगत चीजों का अच्छा होनाIराजा के लिए आवश्यक है कि सम्पूर्ण आवश्यक कार्यों को स्वयं ही देखे तथा सुने किन्तु टालने की कभी कोशिश न करेIआचार्य कौटिल्य के प्रधान शिष्य कामंदक भी अपनी नीतिसार के लिए बहुत प्रसिद्द हैंI हम कह सकते हैं कि कमान्द्कीय नीतिसार कौटिल्य के नीतिसार का विस्तार हैI उन्होंने राजा और उसके कर्तव्यों का भली-भांति वर्णन किया हैI

न्यायप्रवृत्तो नृपतिरात्मानमपि च प्रजा:I

त्रिवर्गेनोपसन्धत्ते निहन्ति ध्रुवंन्यथाII (का. नि. सर्ग 1, 13)

स श्लोक में कामंदक जिस समय राजा न्यायपरायण होता है तब वह अपने को और प्रजा को भी त्रिवर्ग अर्थ, धर्म, काम, का साधन करा सकता है अन्यथा अवश्य ही त्रिवर्गका नाशक होता हैI

प्रजां संरक्षित नृप सा वर्द्ध्यती पार्थिवमI

वर्द्धनाद्रक्षणं श्रेयस्तेदभावे सदप्यसतII(का. नि. सर्ग. 1. 12.)

अर्थात राजा दंडयोग्य लोगों को दण्डविधान और अदंड व्यक्तियों को ससम्मान पूर्वक प्रजाओं को भली प्रकार शत्रुओं के हाथ से रक्षा करके पालन करता है तो प्रजागण भी धन-धान्य आदि द्वारा प्राणपण से राजा की सम्पति बढाती हैI बढ़ना और पालना इनमे पालना ही श्रेयष्कर हैI इसका कारण है कि शत्रुओं हाथ से प्रजा की रक्षा न करने से राजा का मंगल नहीं होताI

काम: क्रोधस्तथा लोभो हर्षो मानो मदस्तथाI

षडवर्गमुतसृजेदेनमस्मिन्तयक्ते सुखी नृप:II (का. नि. सर्ग. 1. 55)

काम, क्रोध, लोभ, हर्ष, मान, मद ये छ: वर्ग राजा को सदा त्यागने चाहियेंI इनके त्यागने से ही राजा सुखी होता हैI

राजा और उसके कार्य व्यवहार से संबंधित ये नीतियाँ पूरे नीतिशास्त्र के ग्रंथों में सविस्तार वर्णित हैंIये नीतियाँ आज भी उतनी ही  प्रासंगिक हैं जितनी उस समय थींI क्योंकि हमने शासक चुनने की विधि बदली है शासन की विधि और उद्देश्य तो सनातन ही हैI अर्थात राज्य और राजा का उदेश्य वही होना चाहिए और आदर्श रूप में आज भी वही है जो उस समय के विद्वानों ने वर्णन किया हैI जिसमें सबसे प्रमुख है जनता का कल्याण, उसकी सुख-समृद्धि, उसकी धर्म-परायणता, राष्ट्र की रक्षा, अव्यवस्था को दूर रखना इत्यादिI भारतीय समाज हमेशा से एक धर्म-परायण समाज रहा है किन्तु एक कोशिश जो बहुत दिनों से जारी है वह यह कि इसे पूरी तरह से इसके मूल चिन्तन से काट दिया जाय ताकि ये अपना मूल-गुण ही खो देंIअब इससे बड़ी विडम्बना क्या हो सकती है कि एक हिन्दू बहुल देश में कोई आयातित व्यक्ति आता है और वह यह बताये कि हिन्दू होना क्या है! इसका कारण है कि बहुत दिनों तक ऐसा बताकर लाभ उठाया गया है कि हिन्दू तो ऐसा होता है कि वह अपने राष्ट्र और धर्म की भी रक्षा नहीं करता अपितु उसे तहस-नहस होने के लिए छोड़ देता हैIबहुत बार इसमें वे लोग सफल भी हो जाते हैं क्योंकि हमे पता ही नहीं हमारे शास्त्र, हमारे चिंतक इन विषयों में क्या कहते हैं? इसीलिए तो इनकी कोशिश है कि लोगों को भारतीय ज्ञान परम्परा से बहुत दूर रखा जाय किन्तु हमारी शुभता यही है कि सनातन का सत्य कभी छुपता नहीं हैI यह बार-बार उसी आलोक से उदित होता है और हमारा यह कर्तव्य है कि हम उस सत्य को प्रसारित करने के निमित्त बनेंI


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