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अद्वैत वेदांत द्वारा विश्व की समस्याओ का परिहार

June 26, 2022 Authored by: Dr. Vikas Singh

द्वैतवाद वह दार्शनिक विचारधारा है, जो दो तत्व को मौलिक मानता है। वह दो तत्व है-चेतन तथा जड़ (भौतिक)। इस संसार में सामान्यतः हमें ऐसे पदार्थ दिखाई पड़ते हैं, जिनमें चेतना या ज्ञान का नितान्त अभाव है और साथ ही हमें ऐसे जीवित प्राणी भी दिखाई पड़ते हैं, जिनमे चेतना के विभिन्न रूप जैसे-ज्ञानात्मक, भावनात्मक, संवेगात्मक, इत्यादि परिलक्षित होते हैं। यहां तक कि स्वयं के व्यक्तित्व में भी दो विपरीत गुण वाले विस्तार और विचार दिखाई पड़ते है, जिसमें विस्तार, शरीर का तथा विचार मन का गुण है। अतः अनेक विचारकों ने, उक्त सामान्य बुद्धि के अनुरूप, यह अवधारणा प्रतिपादित किया कि इस चराचर जगत के आधारभूत ‘जड़’ और ‘चेतन’ दो पृथक तत्व हैं, जिन्हें एक-दूसरे के रूप में परिणत नहीं किया जा सकता। यही विचार दर्शनशास्त्र के अन्तर्गत द्वैतवाद के रूप में जाना जाता है।

               चूंकि दर्शनशास्त्र विषय की प्रकृति बहुआयामी होती है अतः इस बात को कहने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि दर्शनशास्त्र के अन्तर्गत जो अवधारणाएं हमें परिलक्षित होती है, उनकी भी प्रकृति बहुआयामी ही होगी। इसी समझ के आधार पर मैंने ‘द्वैतवाद के कारण वैश्विक समस्याएं एवं चुनौतियां’’ विषय को दार्शनिक तथा सामाजिक संदर्भ में देखने का विनित प्रयास किया है।

द्वैतवाद का दार्शनिक इतिहास

               पश्चिम की विचारधारा वस्तु/घटना/तथ्य को खण्डों में देखना और समझना चाहती है यही कारण है कि उनके वहां दर्शन के प्रारम्भ से लेकर आज तक वह सृष्टि के चरम तत्व के रूप में 2 तत्व को स्वीकार किये हैं। जैसे-प्लेटो ने सृष्टि के चरम तत्व के रूप में 2 तत्वों को स्वीकार किया है-

1.            निरपेक्ष तत्व

2.            सापेक्ष तत्व

               जो निरपेक्ष तत्व है उसको प्लेटो शुभ का प्रत्यय कहता है। प्लेटो को अनुसार-यह शुभ का प्रत्यय ने तो हमारे मन में है और ना ही इस लौकिक जगत में है इसलिए प्रत्यय सापेक्ष नहीं है। अपितु यह अलौकिक, निरपेक्ष, निरवयव सत्ता है। तथा सापेक्ष तत्व वह है, जो इस संसार में विद्यमान है।

               आधुनिक काल में प्रथम द्वितत्ववादी दार्शनिक रेने देकार्ट (फ्रांसीसी दार्शनिक) ने भी इस विश्व के दो चरम तत्व माना।

1. पुद्गल 2. मनस्

↓           ↓

(जड़ पदार्थ)     (चेतन पदार्थ)

↓           ↓

का गुण-विस्तार  का गुण-विस्तार

द्वैतवाद के पक्ष में युक्ति-

1.            सामान्य भाषा संबंधी युक्ति

2.            सामान्य अनुभव संबंधी युक्ति

               द्वैतवादी विचारक कहते हैं कि उनके मत को साधारण भाषा से महत्वपूर्ण समर्थन प्राप्त है। सामान्य भाषा में ‘शरीर’ और ‘मन’ ये दो शब्द पृथक-पृथक तत्वों के द्योतक समझे जाते हैं, एक तत्व के नहीं।    

               प्रोफेसर पैट्रिक ने बड़े ही आकर्षक तरीके से इस साधारण भाषा के महत्व को प्रस्तुत किया है-’‘कोई भी व्यक्ति यह नहीं कहता कि इतने वर्ग गज प्रेम है, इतने सेर आशा है, या इतने इंच विचार है, और ना ही यह कहता है कि तारे प्रेम करते हैं, परमाणु आशा रखते हैं या पर्वत विचार करते हैं। हमारी भाषा ने भौतिक पदार्थों तथा मानसिक घटनाओं का पूर्णतया विभाजन कर रखा है। अतः हम भौतिक पदार्थों के लिए जिन शब्दों का प्रयोग करते हैं, मानसिक घटनाओं के लिए उनका प्रयोग नहीं करते।

               द्वितत्ववाद के समर्थक यह प्रतिपादित करते हैं कि सामान्य अनुभव के द्वारा भी उन्हीं के मत का पोषण होता है। जैसे-सामान्य अनुभव हमें बताता है कि जिन पंच ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से हम भौतिक पदार्थों एवं घटनाओं को प्रत्यक्ष करते हैं, उन्हीं पंच ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से हम मानसिक घटनाओं का प्रत्यक्ष नहीं कर सकते। इसके लिए हमें मानसिक इंद्रिय मन को मानना पड़ता है। इसके अतिरिक्त स्मृति और स्वप्न इस तथ्य को और भी अधिक सुदृढ़ कर देते हैं कि भौतिक तत्व के अतिरिक्त एक मानसिक तत्व भी है क्योंकि मानसिक तत्व के अनस्तित्व में स्मृति एवं संभावना दोनों की ही संभावना समाप्त हो जाती है।

द्वैतवाद के विपक्ष में युक्ति-

1.            ज्ञानमीमांसीय युक्ति

2.            अनुभववाद की दार्शनिक व्याख्या के आधार पर द्वैतवाद का खण्डन

               1.            ज्ञानमीमांसीय युक्ति-ज्ञानमीमांसा के क्षेत्र में भी द्वितत्ववाद के सम्मुख एक कठिनाई उपस्थित होती है। यदि पुद्गल और मनस एक-दूसरे से सर्वथा असम्बद्ध और स्वतंत्र तत्व है तो मनस् को पुद्गल अर्थात् भौतिक पदार्थों का ज्ञान कैसे होता है? मनस को भौतिक पदार्थों का ज्ञान होता है, यह तो सभी के प्रत्यक्ष अनुभव की बात है, जिसे कोई अस्वीकार नहीं कर सकता। इस प्रकार द्वितत्ववादी दार्शनिकों के पास इस ज्ञानमीमांसा  संबंधी कठिनाई को दूर करने का कोई उपाय नहीं है।

               वास्तविकता यह है कि जब हम द्वितत्ववाद के मूल स्वरूप का विश्लेषण करने लगते हैं तो हमें इस समस्या का कोई ज्ञानमीमांसीय समाधान नहीं मिल पाता है कि जब जड़ और चेतन एक दूसरे से पूर्ण स्वतंत्र और विरोधी स्वभाव वाले है, जैसा कि द्वैतवाद की केन्द्रीय मान्यता है, तब यह समझ में नहीं आता कि इनका परस्पर सहयोग कैसे हो जाता है और वे एक-दूसरे से संयुक्त होकर कैसे इस विश्व की रचना कर देते हैं?

               द्वितत्ववादी दार्शनिकों ने अपने मत के समर्थन में अनुभव को प्रमाण रूप में प्रस्तुत किया है। यहां तक कोई समस्या नहीं है, क्योंकि अनुभव को प्रमाण तो सभी अनुभववादी दार्शनिक स्वीकार करते हैं, परन्तु जब तक गंभीर विश्लेषण के पश्चात् उसे ठोस आधारभूमि पर स्थापित न किया जाये, तब तक उसे प्रमाण मान लेना भारी दार्शनिक भूल है, क्योंकि जीवन में हमें ऐसे अनेकों अनुभव प्राप्त होते हैं जो विश्लेषण के उपरान्त भ्रम साबित होते हैं, और जिनका सत्य से तनिक भी सम्बन्ध नहीं होता। अतः द्वितत्ववादी विचारकों की यह बात दार्शनिक दृष्टि से समुचित प्रतीत नहीं होता है, क्योंकि वह बिना किसी विश्लेषण तथा पर्यवेक्षण ;ब्तपबनउेचमबजपवदद्ध के अनुभव को सामान्य/सहज अनुभव के रूप में लेते हैं।

               भारतीय विचारधारा मे भी द्वैतवाद सम्बन्धी सिद्धान्त प्रचुर रूप में पुष्पित तथा पल्लवित हुआ है, लेकिन यह कभी भी लंबे समय तक भारतीय जनमानस की आम विचारधारा नहीं बन पाई है, फिर भी दार्शनिक संदर्भ में द्वैतवाद का अपना एक प्रमुख स्थान है।

               भारतीय विचारधारा में द्वैतवाद के प्रतिनिधि विचारक कपिल मुनि है जिनके द्वारा प्रतिपादित दर्शन सांख्य के नाम से प्रचलित है।

               जैसा कि पूर्व में मैंने उल्लेख किया है कि द्वैतवादी दर्शन की सबसे बड़ी कठिनाई स्वीकृत दो तत्वों के बीच का सम्बन्ध निरूपण हैं। सांख्य दर्शन भी इस कठिनाई से मुक्त नहीं है। विदित है कि सांख्य दर्शन दो विरोधी गुण और स्वभाव वाले तत्वों यथा-प्रकृति और पुरुष के बीच संबंध बताने के लिए अलंकारिक भाषा का सहारा लेता है, लेकिन दार्शनिक रूप से वह इन दो विरोधी स्वभाव वाले तत्वों के बीच के सम्बन्ध को व्याख्यायित करने में असफल रहता है।

द्वैतवादी विचारधारा का सामाजिक संदर्भ

               चूंकि दर्शन जीवन और जगत से जुड़े हुए प्रश्नों को समग्र रूप से समझने का प्रयास है, अतः यह बात स्पष्ट रूप से कही जा सकती है कि द्वैतवाद नामक जो दार्शनिक विचारधाारा है, उसका सामाजिक संदर्भ में अध्ययन करना एक प्रकार की दार्शनिक क्रिया ही होगी। इसमें हम यह देखने का प्रयास करेंगे कि द्वैतवाद सम्बन्धी विचारधारा के कारण समाज, राष्ट्र तथा विश्व में किस प्रकार की परिस्थितियां निर्मित हुई हैं।

               द्वैतवादी विचारधारा का अगर हम पश्चिम के दृष्टिकोण से सामाजिक संदर्भ में अध्ययन करें, तो हम पाते है कि वहां का समाज दो भागों में स्पष्ट रूप से विभक्त है। यह विभाजन कई आधारों पर है, जिसका मूल द्वैतवाद सम्बन्धी विचार है। जैसे-

1.            नस्लीय आधार पर भेद

2.            रंग के आधार पर भेद

3.            आर्थिक आधार पर भेद

4.            श्रेष्ठता के आधार पर भेद

5.            लिंग के आधार पर भेद

               अगर हम इन सारे भेदों का ऐतिहासिक और सामाजिक  परिप्रेक्ष्य के रूप में अध्ययन करे तो हमें यह बात दिखाई पड़ेगी कि एक का दूसरे से भेद होने का मुख्य कारण वर्चस्व की स्थापना है और वर्चस्व स्थापित करने का भाव तभी तक रहेगा, जब तक कि कम से कम दो पक्ष  हो।

               हम जानते है कि पश्चिमी यूरोप में नस्लीय तथा आर्थिक आधार पर श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए कितना बड़ा सामाजिक, राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय वैमनस्य बढ़ाने का प्रयास किया गया, इतना ही नहीं बल्कि हिंसक क्रांति भी किया गया, और यह सब होने का कारण था भेदकारी बुद्धि जिसे हम द्वैतवादी बुद्धि भी कह सकते हैं।

भेदकारी बुद्धि/द्वैतवादी बुद्धि का समाज, राष्ट्र और विश्व पर प्रभाव-

1.            वर्ग-संघर्ष को बढ़ावा-जब हमारी दृष्टि द्वैतवादी होगी तो हम प्रकृति को भी द्वैतभाव से ही देखेंगे। इसका परिणाम यह होगा कि हम प्रकृति के विभिन्न संसाधनों को अपना अधिकार समझकर उपभोग करेंगे। फलतः जो दूसरा पक्ष होगा, उसको संसाधन की कमी होगी ऐसे में वर्ग-संघर्ष की भावना प्रबल हो जाएगी। जो समाज और राष्ट्र के लिए अहितकारी होगी।

2.            भ्रष्टाचार को बढ़ावा-भेदकारी या द्वैतवाद दृष्टिकोण के कारण व्यक्ति के अंदर दूसरे के प्रति उदारवादी दृष्टि नहीं बन पाती है, क्योंकि शक्तिसम्पन्न व्यक्ति यह समझता है कि वह सामने वाले से श्रेष्ठ और सामथ्र्यवान है, अतः वह भ्रष्टाचार जैसे अनैतिक कार्य करने में भी संकोच नहीं करता है।

3.            धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा-हर धार्मिक संप्रदाय, जिसका आधार द्वैतवाद हो, वह भेदकारी होगी और भेदकारी होने से वह खुद के संप्रदाय को श्रेष्ठ तथा दूसरे के संप्रदाय को हीन समझेगा, यही भाव कालान्तर में धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा देता है।

               उपर्युक्त विवरणों से यह बात कहीं जा सकती है कि द्वैतवाद के कारण वैश्विक समस्याएं एवं चुनौतियां तो हर देश के समक्ष उपस्थित है, ऐसे में इस समस्या का समाधान कौन से दार्शनिक अवधारणा से प्रस्तुत किया जा सकता है। मेरा यह मानना है कि हम समस्या का समाधान वेदान्त के दृष्टिकोण में सन्निहित है। अस्तु मैं वेदान्त का संक्षेप में परिचय देते हुए इन समस्याओं का समाधान देने का प्रयास करूंगा।

अद्वैत वेदांत का परिचय एवं वेदांत द्वारा समस्याओ का समाधान

अद्वैत वेदांत के प्रस्तोता शंकराचार्य विश्वदर्शन के क्षितिज पर ध्रुव तारे के समान प्रभापूर्ण एवं अटल है। जहाँ एक ओर उनमें कपिल, कणाद, बुद्ध इत्यादि की भाँति आत्मज्ञान की आभा है। वहीं दूसरी ओर नागार्जुन, दिंगनाग और धर्मकीर्ति की भाँति तर्क निर्झरणी भी उनकी लेखनी से प्रवाहमान हुई है। शंकर में यहा एक ओर प्रखर आलोचनात्मक शक्ति है वहीं दूसरी ओर ‘भज गोविन्दम्’ गाने वाला कवि हृदय भी।

वेदान्त दर्शन से एक ऐसी समन्वित दृष्टि मिलती है, जो ऐहिक एवं पारलौकिक सुख के निमित्त व्यवहारिक एवं वैज्ञानिक दृष्टि को प्रस्तुत करती है। सामान्यतः यह कहते सुना जाता है कि वेदान्त का जीवन-दर्शन आदर्शपरक है और व्यवहार से दूर। लेकिन शंकराचार्य अपने गीताभाष्य में लौकिक अभ्युदय को मानव का प्राप्तव्य बतलाया।  शंकराचार्य ने स्पष्ट रूप से ‘‘भोगापवर्गों पुरूषार्थों’’  कहकर भोग एवं मोक्ष दोनों को ही जीवन का प्राप्तव्य बतलाया है। इतना ही नहीं जो एक सुसंगत दर्शन की विशेषता होती है, वह वेदान्त के महान भाष्यकार शंकराचार्य के व्यक्तित्व तथा कृतित्व में स्पष्टतः दिखाई पड़ती है।  जैसे-

1.            एक अच्छी दर्शन पद्धति की सैद्धान्तिक-मान्यताएं गिनती में कम होती हैं।

2.            उसका तर्कसंगत आधार पुष्ट होता है।

3.            वह समस्याओं का सुसम्बद्ध, बुद्धिगम्य हल प्रस्तुत करती है।

               अद्धैत वेदान्त की मुख्य मान्यताएं चार हैं-

ऽ     एक मात्र तात्विक पदार्थ निर्गुण, कूटस्थ नित्य, सच्चिदानन्द ब्रह्म है।

ऽ     जीव और ब्रह्म एक ही है।

ऽ     जीव और ब्रह्म में जो भेद दिखाई पड़ता है उसका कारण अनादि अविद्या है।

ऽ     यह दृश्यमान जगत् माया का कार्य अतैव मिथ्या है।

             अद्धैत वेदान्त का तर्कसंगत आधार इतना पुष्ट है कि प्रो0 चन्द्रधर शर्मा ने उसे समस्त भारतीय दर्शन का मोर मुकुट कहा है।

             समस्याओं का वेदान्तिक दृष्टिकोण से समाधान में मैं मूल रूप से उन्हीं तीन समस्याओं के समाधान प्रस्तुत करने की कोशिश करूंगा, जिनका उल्लेख मैंने पहले किया है।

1.            विचार करने से यह विदित होता है कि युद्ध की अवधारणा साम्राज्यवादी है, और साम्राज्यवाद का आरंभिक बिन्दु श्रेष्ठता का सिद्धान्त है, जबकि वेदान्त का उद्घोष है-‘‘सर्वं खल्विंद ब्रह्म’’ (छा0उ0 3/14/1) ‘एकमेवाद्वितीयम््’’ (छा0उ0 6/2/2)

               अर्थात् सर्वत्र एक की ही सत्ता है, तो इस सिद्धान्त के आधार पर साम्राज्यवाद की नीति को सही नहीं ठहराया जा सकता। अतः युद्ध की नीति भी वेदान्त के अनुसार सही नहीं है। इस संदर्भ में महाभारतकार का यह कथन उल्लेखनीय हो जाता है कि ’’जो तुम्हारे लिये प्रतिकूल हो वह दूसरों के साथ मत करो यही धर्म है।’’  वेदान्त का वर्ग-संघर्ष की अवधारणा के सापेक्ष एक प्रमुख सामाजिक, राजनीतिक सिद्धान्त ‘अहिंसा’ की अवधारणा है जो कि आधुनिक वेदान्त का एक प्रमुख सिद्धान्त है। यह अहिंसा की अवधारणा न केवल भारत अपितु पूरे विश्व की नीति और विचार को प्रभावित किया है।

               वर्ग-संघर्ष का केन्द्रीय आधार द्वैत है, जबकि अहिंसा का केन्द्रीय आधार अद्वैत है। वेदान्त के अनुसार एक ही आत्मा सभी में व्याप्त है। अगर हम किसी से हिंसा करंेगे तो मूलतः अपने साथ ही हिंसा करंेगे। वेदान्तसार के टीकाकार रामतीर्थ ने विद्वन्मनोरंजनी के अन्तर्गत अहिंसा की परिभाषा करते हुए कहा है-‘‘मन्, वचन एवं काया से दूसरे को पीड़ा न पहुंचाना ही अहिंसा है।  अहिंसा प्रभृति सिद्धान्त, वेदान्त के एकात्मवाद की ही प्रकारान्तर से की गई व्याख्याएं है। वस्तुतः वेदान्त का एकात्मवाद ही भारतीय जीवन-दर्शन की आधारशिला एवं वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना का मूल है।

2.            कठोपनिषद् में कहा गया है कि द्वैतबुद्धि वाले लोगों में उचित-अनुचित का विवेक नहीं होता है। उनमें न तो पवित्रता, न उचित आचरण और न सत्य के मार्ग का अनुसरण करने की प्रवृत्ति पायी जाती है। आसुरी प्रवृत्ति के लोग भोगवादी एवं भौतिक सभ्यता के पोषक होते हैं। उनका विश्वास है कि  इंद्रियजन्य सुखों की तुष्टि ही मानवजीवन की मूलभूत आवश्यकता है। इसी की चिन्ता उन्हें आजन्म रहती है। वे इच्छाओं और आवश्यकताओं के जाल में बंध कर काम एवं क्रोध के वशीभूत होकर अवैध तरीके से धन संचय करते हैं। इस प्रकार के लोगों में धन अर्जित करने की इच्छा की कोई सीमा नहीं होती है।  यही भ्रष्टाचार एवं अनैतिकता का मूल आधार है, किन्तु ऐसे लोगों को न तो सुख मिलता है और न ही शान्ति मिलती है, क्योंकि वे शास्त्रों के आदेशों (आधुनिक भाषा में संविधान और विधि के शासन) का उल्लंघन करते रहते हैं। ऐसे दुराचारी लोग अवैध सम्पत्ति संचित करने के लिए हिंसा का सहारा लेते हैं। वे सोचते हैं-वह मेरा शत्रु है और मैंने उसे मार दिया तथा मेरे अन्य शत्रु भी मारे जायेंगे इत्यादि। ऐसे दंभी और अहंकारी लोग अधम गति को प्राप्त होते हैं।  यह दोनों संदर्भ (कठोपनिषद, गीता) भ्रष्टाचार तथा अनैतिकता के संदर्भ में द्वैतवादी बुद्धि को ही विवेचित कर रहा है।

               भ्रष्टाचार और अनैतिकता जैसे अवधारणाओं का अगर हम वेदांतिक दृष्टिकोण से समाधान करना चाहें, तो वह गीता के अनासक्ति भाव और श्रीरामकृष्ण व शंकराचार्य के जीवन परिचय तथा गांधी के अपरिग्रह के सिद्धान्त में स्पष्टता के साथ परिलक्षित होता है। क्योंकि भ्रष्टाचार जैसा नैतिक आचरण वही व्यक्ति कर सकता है, जो यह विश्वास रखता है कि एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से अलग और श्रेष्ठ है। अर्थात् वह अहंभाव वाला हो।

3.            धार्मिक कट्टरता वर्तमान युग की एक यथार्थ समस्या है। धार्मिक कट्टरता का मूल आधार यह है कि केवल मेरा धर्म ही श्रेष्ठ है, बाकी धर्म हीन है इसीलिए, समय-समय पर इस्लाम तथा ईसाइयत ने विभिन्न उपकरणों के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया कि उनके द्वारा पूरे विश्व का इस्लामीकरण करना या ईसायीकरण करना ही उनका उद्देश्य है।

               यही कारण है कि धार्मिक कट्टरता के कारण बहुत सारे इतिहास में अमानवीय कार्य के दृष्टान्त मिलते है।

               इस समस्या के संदर्भ में मैं वेदान्त के प्रस्थान ग्रंथों में से गीता प्रस्थान के कुछ श्लोक का उल्लेख करना चाहूंगा, जिससे यह बात स्पष्ट रूप से परिभाषित हो जाएगा कि वेदांत की दृष्टि में कट्टरता नहीं, अपितु प्राणीमात्र के प्रति समदर्शी दृष्टि को ही यथार्थ धार्मिक दृष्टि कहा गया है।

‘‘यो यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।

मम वत्र्मानुवर्तन्ते मनुष्यः पार्थ सर्वशः’’       -गीता (14/11)

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणेगवि हस्तिनि।

शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।।  -गीता-5/18

यो मां पश्यति सवत्र्र सर्वं च मयि पश्यति।

तस्याहं न प्रणश्यामि स च मेन प्रणश्यति।।  -गीता-6/30

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।

ईक्षते योग युक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः।।           -गीता-6/29

               वस्तुतः यह वेदांतिक दृष्टिकोण समाज और राष्ट्र की सांस्कृतिक बहुलता एवं लोगों के धर्म-मनोविज्ञान को ध्यान में रखते हुए विभिन्न धर्मों के बीच परस्पर सांमजस्य बनाने का प्रयास है।

               उपर्युक्त समस्याओं के संदर्भ में जब हम वेदान्तिक दृष्टिकोण से समाधान प्राप्त करना चाहते हैं, तो एक नया विचार हमारे समक्ष उपस्थित होता है, जिसे हम एकात्मकता के वैश्विक संदर्भ के रूप में देख सकते हैं। यह एक आध्यात्मिक अवधारणा है, लेकिन जब हम इसे दर्शनशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य में देखने की कोशिश करेंगे तो यह अद्वैत दर्शन के रूप में हमारे समक्ष प्रस्तुत होगा। अद्वैत दर्शन को धर्म और संप्रदाय की सीमाओं में नहीं बाधा जा सकता, क्योंकि एक अच्छे व्यक्ति में जिन बातों की कल्पना हम कर सकते हैं, वहीं इस दर्शन में है। यह वास्तविक मनुष्य बनाने वाले दर्शन है। यह वैश्विक समरसता की स्थापना करने वाला दर्शन है।

एकात्मता का  सन्देश

एकात्मकता के वैश्विक संदर्भ में मैं शंकराचार्य के वेदान्त का सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक पहलू के संदर्भ में उल्लेख करूंगा।इन्होंने भारतवर्ष की एकीकरण के चार प्रतीक देश के कोनों में स्थापित किये – (१) ज्योतिष्पीठ बदरिकाश्रम, (२) श्रृंगेरी पीठ, (३) द्वारिका शारदा पीठ और (४) पुरी गोवर्धन पीठ अगर हम शंकराचार्य के जीवन को देखें तो उनमें हमें सम्पूर्ण भारतीय धर्म, दर्शन और संस्कृति समग्र रूप से परिलक्षित होती है, जो एक सभ्यता दर्शन का आधार प्रस्तुत करती है। यह सभ्यता दर्शन एकता का दर्शन है और यह एकता का दर्शन इस आधार पर टीका है कि जो नश्वर है उसे छोड़ व्यक्ति को उस तत्व को पाने का प्रयास करना चाहिए, जो चिरस्थायी और शांतिप्रदायक हो।

               भारतीय दर्शन के इतिहास में शंकर का स्थान स्थायी भी है और उच्च भी। यद्यपि उन्होंने मौलिकता का कोई दावा अपने लिए स्वीकार नहीं किया है फिर भी मनुष्यों के चित्त में उन्होंने एक क्रांति उत्पन्न कर दी, जिसके हितकारी परिणाम आज दिखाई पड़ रहे हैं। चिन्तन पद्धति और भाष्य लिखने में उन्होंने एक आदर्श स्थापित कर दिया, जिसका अनुसरण करने की चेष्ठा भारत के परवर्ती दार्शनिकों ने भी किया। उनकी रचनाओं की विशिष्टता है-मर्मभेदी अन्तर्दृष्टि और विश्लेषणात्मक नैपुण्य। हमारे वैदिक परंपरा से लेकर आचार्य शंकर तक जो वैचारिक विकास है, उसमें कहीं भी मानव केन्द्रित द्वैतबोध की दृष्टि नहीं मिलेगी  बल्कि‘ईशावस्यमिदं सर्वं’ तथा ‘त्येन त्यक्तेन भुंजीथा’ की दृष्टि मिलेगी। क्योंकि इस प्रकृति पर केवल पुरुष का एकाधिकार नहीं है, बल्कि जड़, जंगम, स्थावर के भी अपने-अपने अधिकार है। अतः यह सर्वसमादर की चराचरवादी दृष्टि है। इस बात को गोस्वामी तुलसीदास के मंगलाचरण से समझा जा सकता है, जब वह कहते है-

‘‘आकर चार लाख चैरासी  जाति, जीव, जल-थल नभवासी’’। यह संपूर्ण चराचर की दृष्टि है, जब वह अपने महाकाव्य की शुरूआत ईश्वर के प्रति प्रार्थना से न कर जड़, जीव, जंगम, स्थावर, उद्भिज से करते है।

               यह सभ्यता बोध मनुष्य का मनुष्य से, मनुष्य का प्रकृति से मनुष्य का ईश्वर से द्वैतभाव नहीं रखता है। अतः हमारी सभ्यता अद्वैतबोध के आधार पर निर्मित है।

अद्वैत वेदांत द्वारा विश्व की समस्याओ का परिहार.

द्वैतवाद वह दार्शनिक विचारधारा है, जो दो तत्व को मौलिक मानता है। वह दो तत्व है-चेतन तथा जड़ (भौतिक)। इस संसार में सामान्यतः हमें ऐसे पदार्थ दिखाई पड़ते हैं, जिनमें चेतना या ज्ञान का नितान्त अभाव है और साथ ही हमें ऐसे जीवित प्राणी भी दिखाई पड़ते हैं, जिनमे चेतना के विभिन्न रूप जैसे-ज्ञानात्मक, भावनात्मक, संवेगात्मक, इत्यादि परिलक्षित होते हैं। यहां तक कि स्वयं के व्यक्तित्व में भी दो विपरीत गुण वाले विस्तार और विचार दिखाई पड़ते है, जिसमें विस्तार, शरीर का तथा विचार मन का गुण है। अतः अनेक विचारकों ने, उक्त सामान्य बुद्धि के अनुरूप, यह अवधारणा प्रतिपादित किया कि इस चराचर जगत के आधारभूत ‘जड़’ और ‘चेतन’ दो पृथक तत्व हैं, जिन्हें एक-दूसरे के रूप में परिणत नहीं किया जा सकता। यही विचार दर्शनशास्त्र के अन्तर्गत द्वैतवाद के रूप में जाना जाता है।

               चूंकि दर्शनशास्त्र विषय की प्रकृति बहुआयामी होती है अतः इस बात को कहने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि दर्शनशास्त्र के अन्तर्गत जो अवधारणाएं हमें परिलक्षित होती है, उनकी भी प्रकृति बहुआयामी ही होगी। इसी समझ के आधार पर मैंने ‘द्वैतवाद के कारण वैश्विक समस्याएं एवं चुनौतियां’’ विषय को दार्शनिक तथा सामाजिक संदर्भ में देखने का विनित प्रयास किया है।

द्वैतवाद का दार्शनिक इतिहास

               पश्चिम की विचारधारा वस्तु/घटना/तथ्य को खण्डों में देखना और समझना चाहती है यही कारण है कि उनके वहां दर्शन के प्रारम्भ से लेकर आज तक वह सृष्टि के चरम तत्व के रूप में 2 तत्व को स्वीकार किये हैं। जैसे-प्लेटो ने सृष्टि के चरम तत्व के रूप में 2 तत्वों को स्वीकार किया है-

1.            निरपेक्ष तत्व, जिसे वह श्प्कमं व िजीम ळववकश् कहता है।

2.            सापेक्ष तत्व, जिसे वह श्डंजजमतश् कहता है।

               जो निरपेक्ष तत्व है उसको प्लेटो शुभ का प्रत्यय ;प्कमं व िळववकद्ध कहता है। प्लेटो को अनुसार-यह शुभ का प्रत्यय ने तो हमारे मन में है और ना ही इस लौकिक जगत में है इसलिए प्रत्यय सापेक्ष नहीं है। अपितु यह अलौकिक, निरपेक्ष, निरवयव सत्ता है। तथा सापेक्ष तत्व वह है, जो इस संसार में विद्यमान है।

               आधुनिक काल में प्रथम द्वितत्ववादी दार्शनिक रेने देकार्ट (फ्रांसीसी दार्शनिक) ने भी इस विश्व के दो चरम तत्व माना।

1. पुद्गल 2. मनस्

↓           ↓

(जड़ पदार्थ)    (चेतन पदार्थ)

↓           ↓

का गुण-विस्तार  का गुण-विस्तार

द्वैतवाद के पक्ष में युक्ति-

1.            सामान्य भाषा संबंधी युक्ति

2.            सामान्य अनुभव संबंधी युक्ति

               द्वैतवादी विचारक कहते हैं कि उनके मत को साधारण भाषा से महत्वपूर्ण समर्थन प्राप्त है। सामान्य भाषा में ‘शरीर’ और ‘मन’ ये दो शब्द पृथक-पृथक तत्वों के द्योतक समझे जाते हैं, एक तत्व के नहीं।    

               प्रोफेसर पैट्रिक ने बड़े ही आकर्षक तरीके से इस साधारण भाषा के महत्व को प्रस्तुत किया है-’‘कोई भी व्यक्ति यह नहीं कहता कि इतने वर्ग गज प्रेम है, इतने सेर आशा है, या इतने इंच विचार है, और ना ही यह कहता है कि तारे प्रेम करते हैं, परमाणु आशा रखते हैं या पर्वत विचार करते हैं। हमारी भाषा ने भौतिक पदार्थों तथा मानसिक घटनाओं का पूर्णतया विभाजन कर रखा है। अतः हम भौतिक पदार्थों के लिए जिन शब्दों का प्रयोग करते हैं, मानसिक घटनाओं के लिए उनका प्रयोग नहीं करते।

               द्वितत्ववाद के समर्थक यह प्रतिपादित करते हैं कि सामान्य अनुभव के द्वारा भी उन्हीं के मत का पोषण होता है। जैसे-सामान्य अनुभव हमें बताता है कि जिन पंच ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से हम भौतिक पदार्थों एवं घटनाओं को प्रत्यक्ष करते हैं, उन्हीं पंच ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से हम मानसिक घटनाओं का प्रत्यक्ष नहीं कर सकते। इसके लिए हमें मानसिक इंद्रिय मन को मानना पड़ता है। इसके अतिरिक्त स्मृति और स्वप्न इस तथ्य को और भी अधिक सुदृढ़ कर देते हैं कि भौतिक तत्व के अतिरिक्त एक मानसिक तत्व भी है क्योंकि मानसिक तत्व के अनस्तित्व में स्मृति एवं संभावना दोनों की ही संभावना समाप्त हो जाती है।

द्वैतवाद के विपक्ष में युक्ति-

1.            ज्ञानमीमांसीय युक्ति

2.            अनुभववाद की दार्शनिक व्याख्या के आधार पर द्वैतवाद का खण्डन

               1.            ज्ञानमीमांसीय युक्ति-ज्ञानमीमांसा के क्षेत्र में भी द्वितत्ववाद के सम्मुख एक कठिनाई उपस्थित होती है। यदि पुद्गल और मनस एक-दूसरे से सर्वथा असम्बद्ध और स्वतंत्र तत्व है तो मनस् को पुद्गल अर्थात् भौतिक पदार्थों का ज्ञान कैसे होता है? मनस को भौतिक पदार्थों का ज्ञान होता है, यह तो सभी के प्रत्यक्ष अनुभव की बात है, जिसे कोई अस्वीकार नहीं कर सकता। इस प्रकार द्वितत्ववादी दार्शनिकों के पास इस ज्ञानमीमंासा संबंधी कठिनाई को दूर करने का कोई उपाय नहीं है।

               वास्तविकता यह है कि जब हम द्वितत्ववाद के मूल स्वरूप का विश्लेषण करने लगते हैं तो हमें इस समस्या का कोई ज्ञानमीमांसीय समाधान नहीं मिल पाता है कि जब जड़ और चेतन एक दूसरे से पूर्ण स्वतंत्र और विरोधी स्वभाव वाले है, जैसा कि द्वैतवाद की केन्द्रीय मान्यता है, तब यह समझ में नहीं आता कि इनका परस्पर सहयोग कैसे हो जाता है और वे एक-दूसरे से संयुक्त होकर कैसे इस विश्व की रचना कर देते हैं?

               द्वितत्ववादी दार्शनिकों ने अपने मत के समर्थन में अनुभव को प्रमाण रूप में प्रस्तुत किया है। यहां तक कोई समस्या नहीं है, क्योंकि अनुभव को प्रमाण तो सभी अनुभववादी दार्शनिक स्वीकार करते हैं, परन्तु जब तक गंभीर विश्लेषण के पश्चात् उसे ठोस आधारभूमि पर स्थापित न किया जाये, तब तक उसे प्रमाण मान लेना भारी दार्शनिक भूल है, क्योंकि जीवन में हमें ऐसे अनेकों अनुभव प्राप्त होते हैं जो विश्लेषण के उपरान्त भ्रम साबित होते हैं, और जिनका सत्य से तनिक भी सम्बन्ध नहीं होता। अतः द्वितत्ववादी विचारकों की यह बात दार्शनिक दृष्टि से समुचित प्रतीत नहीं होता है, क्योंकि वह बिना किसी विश्लेषण तथा पर्यवेक्षण ;ब्तपबनउेचमबजपवदद्ध के अनुभव को सामान्य/सहज अनुभव के रूप में लेते हैं।

               भारतीय विचारधारा मे भी द्वैतवाद सम्बन्धी सिद्धान्त प्रचुर रूप में पुष्पित तथा पल्लवित हुआ है, लेकिन यह कभी भी लंबे समय तक भारतीय जनमानस की आम विचारधारा नहीं बन पाई है, फिर भी दार्शनिक संदर्भ में द्वैतवाद का अपना एक प्रमुख स्थान है।

               भारतीय विचारधारा में द्वैतवाद के प्रतिनिधि विचारक कपिल मुनि है जिनके द्वारा प्रतिपादित दर्शन सांख्य के नाम से प्रचलित है।

               जैसा कि पूर्व में मैंने उल्लेख किया है कि द्वैतवादी दर्शन की सबसे बड़ी कठिनाई स्वीकृृत दो तत्वों के बीच का सम्बन्ध निरूपण हैं। सांख्य दर्शन भी इस कठिनाई से मुक्त नहीं है। विदित है कि सांख्य दर्शन दो विरोधी गुण और स्वभाव वाले तत्वों यथा-प्रकृति और पुरुष के बीच संबंध बताने के लिए अलंकारिक भाषा का सहारा लेता है, लेकिन दार्शनिक रूप से वह इन दो विरोधी स्वभाव वाले तत्वों के बीच के सम्बन्ध को व्याख्यायित करने में असफल रहता है।

द्वैतवादी विचारधारा का सामाजिक संदर्भ

               चूंकि दर्शन जीवन और जगत से जुड़े हुए प्रश्नों को समग्र रूप से समझने का प्रयास है, अतः यह बात स्पष्ट रूप से कही जा सकती है कि द्वैतवाद नामक जो दार्शनिक विचारधाारा है, उसका सामाजिक संदर्भ में अध्ययन करना एक प्रकार की दार्शनिक क्रिया ही होगी। इसमें हम यह देखने का प्रयास करेंगे कि द्वैतवाद सम्बन्धी विचारधारा के कारण समाज, राष्ट्र तथा विश्व में किस प्रकार की परिस्थितियां निर्मित हुई हैं।

               द्वैतवादी विचारधारा का अगर हम पश्चिम के दृष्टिकोण से सामाजिक संदर्भ में अध्ययन करें, तो हम पाते है कि वहां का समाज दो भागों में स्पष्ट रूप से विभक्त है। यह विभाजन कई आधारों पर है, जिसका मूल द्वैतवाद सम्बन्धी विचार है। जैसे-

1.            नस्लीय आधार पर भेद

2.            रंग के आधार पर भेद

3.            आर्थिक आधार पर भेद

4.            श्रेष्ठता के आधार पर भेद

5.            लिंग के आधार पर भेद

               अगर हम इन सारे भेदों का ऐतिहासिक और सामाजिक  परिप्रेक्ष्य के रूप में अध्ययन करे तो हमें यह बात दिखाई पड़ेगी कि एक का दूसरे से भेद होने का मुख्य कारण वर्चस्व की स्थापना है और वर्चस्व स्थापित करने का भाव तभी तक रहेगा, जब तक कि कम से कम दो पक्ष/तत्व/सत्ता हो।

               हम जानते है कि पश्चिमी यूरोप में नस्लीय तथा आर्थिक आधार पर श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए कितना बड़ा सामाजिक, राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय वैमनस्य बढ़ाने का प्रयास किया गया, इतना ही नहीं बल्कि हिंसक क्रांति भी किया गया, और यह सब होने का कारण था भेदकारी बुद्धि जिसे हम द्वैतवादी बुद्धि भी कह सकते हैं।

भेदकारी बुद्धि/द्वैतवादी बुद्धि का समाज, राष्ट्र और विश्व पर प्रभाव-

1.            वर्ग-संघर्ष को बढ़ावा-जब हमारी दृष्टि द्वैतवादी होगी तो हम प्रकृति को भी द्वैतभाव से ही देखेंगे। इसका परिणाम यह होगा कि हम प्रकृति के विभिन्न संसाधनों को अपना अधिकार समझकर उपभोग करेंगे। फलतः जो दूसरा पक्ष होगा, उसको संसाधन की कमी होगी ऐसे में वर्ग-संघर्ष की भावना प्रबल हो जाएगी। जो समाज और राष्ट्र के लिए अहितकारी होगी।

2.            भ्रष्टाचार को बढ़ावा-भेदकारी या द्वैतवाद दृष्टिकोण के कारण व्यक्ति के अंदर दूसरे के प्रति उदारवादी दृष्टि नहीं बन पाती है, क्योंकि शक्तिसम्पन्न व्यक्ति यह समझता है कि वह सामने वाले से श्रेष्ठ और सामथ्र्यवान है, अतः वह भ्रष्टाचार जैसे अनैतिक कार्य करने में भी संकोच नहीं करता है।

3.            धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा-हर धार्मिक संप्रदाय, जिसका आधार द्वैतवाद हो, वह भेदकारी होगी और भेदकारी होने से वह खुद के संप्रदाय को श्रेष्ठ तथा दूसरे के संप्रदाय को हीन समझेगा, यही भाव कालान्तर में धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा देता है।

               उपर्युक्त विवरणों से यह बात कहीं जा सकती है कि द्वैतवाद के कारण वैश्विक समस्याएं एवं चुनौतियां तो हर देश के समक्ष उपस्थित है, ऐसे में इस समस्या का समाधान कौन से दार्शनिक अवधारणा से प्रस्तुत किया जा सकता है। मेरा यह मानना है कि हम समस्या का समाधान वेदान्त के दृष्टिकोण में सन्निहित है। अस्तु मैं वेदान्त का संक्षेप में परिचय देते हुए इन समस्याओं का समाधान देने का प्रयास करूंगा।

अद्वैत वेदांत का परिचय एवं वेदांत द्वारा समस्याओ का समाधान

अद्वैत वेदांत के प्रस्तोता शंकराचार्य विश्वदर्शन के क्षितिज पर ध्रुव तारे के समान प्रभापूर्ण एवं अटल है। जहाँ एक ओर उनमें कपिल, कणाद, बुद्ध इत्यादि की भाँति आत्मज्ञान की आभा है। वहीं दूसरी ओर नागार्जुन, दिंगनाग और धर्मकीर्ति की भाँति तर्क निर्झरणी भी उनकी लेखनी से प्रवाहमान हुई है। शंकर में यहा एक ओर प्रखर आलोचनात्मक शक्ति है वहीं दूसरी ओर ‘भज गोविन्दम्’ गाने वाला कवि हृदय भी।

वेदान्त दर्शन से एक ऐसी समन्वित दृष्टि मिलती है, जो ऐहिक एवं पारलौकिक सुख के निमित्त व्यवहारिक एवं वैज्ञानिक दृष्टि को प्रस्तुत करती है। सामान्यतः यह कहते सुना जाता है कि वेदान्त का जीवन-दर्शन आदर्शपरक है और व्यवहार से दूर। लेकिन शंकराचार्य अपने गीताभाष्य में लौकिक अभ्युदय को मानव का प्राप्तव्य बतलाया।  शंकराचार्य ने स्पष्ट रूप से ‘‘भोगापवर्गों पुरूषार्थों’’  कहकर भोग एवं मोक्ष दोनों को ही जीवन का प्राप्तव्य बतलाया है। इतना ही नहीं जो एक सुसंगत दर्शन की विशेषता होती है, वह वेदान्त के महान भाष्यकार शंकराचार्य के व्यक्तित्व तथा कृतित्व में स्पष्टतः दिखाई पड़ती है।  जैसे-

1.            एक अच्छी दर्शन पद्धति की सैद्धान्तिक-मान्यताएं गिनती में कम होती हैं।

2.            उसका तर्कसंगत आधार पुष्ट होता है।

3.            वह समस्याओं का सुसम्बद्ध, बुद्धिगम्य हल प्रस्तुत करती है।

               अद्धैत वेदान्त की मुख्य मान्यताएं चार हैं-

ऽ     एक मात्र तात्विक पदार्थ निर्गुण, कूटस्थ नित्य, सच्चिदानन्द ब्रह्म है।

ऽ     जीव और ब्रह्म एक ही है।

ऽ     जीव और ब्रह्म में जो भेद दिखाई पड़ता है उसका कारण अनादि अविद्या है।

ऽ     यह दृश्यमान जगत् माया का कार्य अतैव मिथ्या है।

             अद्धैत वेदान्त का तर्कसंगत आधार इतना पुष्ट है कि प्रो0 चन्द्रधर शर्मा ने उसे समस्त भारतीय दर्शन का मोर मुकुट कहा है।

             समस्याओं का वेदान्तिक दृष्टिकोण से समाधान में मैं मूल रूप से उन्हीं तीन समस्याओं के समाधान प्रस्तुत करने की कोशिश करूंगा, जिनका उल्लेख मैंने पहले किया है।

1.            विचार करने से यह विदित होता है कि युद्ध की अवधारणा साम्राज्यवादी है, और साम्राज्यवाद का आरंभिक बिन्दु श्रेष्ठता का सिद्धान्त है, जबकि वेदान्त का उद्घोष है-‘‘सर्वं खल्विंद ब्रह्म’’ (छा0उ0 3/14/1) ‘एकमेवाद्वितीयम््’’ (छा0उ0 6/2/2)

               अर्थात् सर्वत्र एक की ही सत्ता है, तो इस सिद्धान्त के आधार पर साम्राज्यवाद की नीति को सही नहीं ठहराया जा सकता। अतः युद्ध की नीति भी वेदान्त के अनुसार सही नहीं है। इस संदर्भ में महाभारतकार का यह कथन उल्लेखनीय हो जाता है कि ’’जो तुम्हारे लिये प्रतिकूल हो वह दूसरों के साथ मत करो यही धर्म है।’’  वेदान्त का वर्ग-संघर्ष की अवधारणा के सापेक्ष एक प्रमुख सामाजिक, राजनीतिक सिद्धान्त ‘अहिंसा’ की अवधारणा है जो कि आधुनिक वेदान्त का एक प्रमुख सिद्धान्त है। यह अहिंसा की अवधारणा न केवल भारत अपितु पूरे विश्व की नीति और विचार को प्रभावित किया है।

               वर्ग-संघर्ष का केन्द्रीय आधार द्वैत है, जबकि अहिंसा का केन्द्रीय आधार अद्वैत है। वेदान्त के अनुसार एक ही आत्मा सभी में व्याप्त है। अगर हम किसी से हिंसा करंेगे तो मूलतः अपने साथ ही हिंसा करंेगे। वेदान्तसार के टीकाकार रामतीर्थ ने विद्वन्मनोरंजनी के अन्तर्गत अहिंसा की परिभाषा करते हुए कहा है-‘‘मन्, वचन एवं काया से दूसरे को पीड़ा न पहुंचाना ही अहिंसा है।  अहिंसा प्रभृति सिद्धान्त, वेदान्त के एकात्मवाद की ही प्रकारान्तर से की गई व्याख्याएं है। वस्तुतः वेदान्त का एकात्मवाद ही भारतीय जीवन-दर्शन की आधारशिला एवं वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना का मूल है।

2.            कठोपनिषद् में कहा गया है कि द्वैतबुद्धि वाले लोगों में उचित-अनुचित का विवेक नहीं होता है। उनमें न तो पवित्रता, न उचित आचरण और न सत्य के मार्ग का अनुसरण करने की प्रवृत्ति पायी जाती है। आसुरी प्रवृत्ति के लोग भोगवादी एवं भौतिक सभ्यता के पोषक होते हैं। उनका विश्वास है कि  इंद्रियजन्य सुखों की तुष्टि ही मानवजीवन की मूलभूत आवश्यकता है। इसी की चिन्ता उन्हें आजन्म रहती है। वे इच्छाओं और आवश्यकताओं के जाल में बंध कर काम एवं क्रोध के वशीभूत होकर अवैध तरीके से धन संचय करते हैं। इस प्रकार के लोगों में धन अर्जित करने की इच्छा की कोई सीमा नहीं होती है।  यही भ्रष्टाचार एवं अनैतिकता का मूल आधार है, किन्तु ऐसे लोगों को न तो सुख मिलता है और न ही शान्ति मिलती है, क्योंकि वे शास्त्रों के आदेशों (आधुनिक भाषा में संविधान और विधि के शासन) का उल्लंघन करते रहते हैं। ऐसे दुराचारी लोग अवैध सम्पत्ति संचित करने के लिए हिंसा का सहारा लेते हैं। वे सोचते हैं-वह मेरा शत्रु है और मैंने उसे मार दिया तथा मेरे अन्य शत्रु भी मारे जायेंगे इत्यादि। ऐसे दंभी और अहंकारी लोग अधम गति को प्राप्त होते हैं।  यह दोनों संदर्भ (कठोपनिषद, गीता) भ्रष्टाचार तथा अनैतिकता के संदर्भ में द्वैतवादी बुद्धि को ही विवेचित कर रहा है।

               भ्रष्टाचार और अनैतिकता जैसे अवधारणाओं का अगर हम वेदांतिक दृष्टिकोण से समाधान करना चाहें, तो वह गीता के अनासक्ति भाव और श्रीरामकृष्ण परमहंस (विवेकानन्द के गुरू) व शंकराचार्य के जीवन परिचय तथा गांधी के अपरिग्रह के सिद्धान्त में स्पष्टता के साथ परिलक्षित होता है। क्योंकि भ्रष्टाचार जैसा नैतिक आचरण वही व्यक्ति कर सकता है, जो यह विश्वास रखता है कि एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से अलग और श्रेष्ठ है। अर्थात् वह अहंभाव वाला हो।

3.            धार्मिक कट्टरता वर्तमान युग की एक यथार्थ समस्या है। धार्मिक कट्टरता का मूल आधार यह है कि केवल मेरा धर्म ही श्रेष्ठ है, बाकी धर्म हीन है इसीलिए, समय-समय पर इस्लाम तथा ईसाइयत ने विभिन्न उपकरणों के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया कि उनके द्वारा पूरे विश्व का इस्लामीकरण करना या ईसायीकरण करना ही उनका उद्देश्य है।

               यही कारण है कि धार्मिक कट्टरता के कारण बहुत सारे इतिहास में अमानवीय कार्य के दृष्टान्त मिलते है।

               इस समस्या के संदर्भ में मैं वेदान्त के प्रस्थान ग्रंथों में से गीता प्रस्थान के कुछ श्लोक का उल्लेख करना चाहूंगा, जिससे यह बात स्पष्ट रूप से परिभाषित हो जाएगा कि वेदांत की दृष्टि में कट्टरता नहीं, अपितु प्राणीमात्र के प्रति समदर्शी दृष्टि को ही यथार्थ धार्मिक दृष्टि कहा गया है।

‘‘यो यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।

मम वत्र्मानुवर्तन्ते मनुष्यः पार्थ सर्वशः’’                          -गीता (14/11)

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणेगवि हस्तिनि।

शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।।  -गीता-5/18

यो मां पश्यति सवत्र्र सर्वं च मयि पश्यति।

तस्याहं न प्रणश्यामि स च मेन प्रणश्यति।।  -गीता-6/30

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।

ईक्षते योग युक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः।।           -गीता-6/29

               वस्तुतः यह वेदांतिक दृष्टिकोण समाज और राष्ट्र की सांस्कृतिक बहुलता एवं लोगों के धर्म-मनोविज्ञान को ध्यान में रखते हुए विभिन्न धर्मों के बीच परस्पर सांमजस्य बनाने का प्रयास है।

               उपर्युक्त समस्याओं के संदर्भ में जब हम वेदान्तिक दृष्टिकोण से समाधान प्राप्त करना चाहते हैं, तो एक नया विचार हमारे समक्ष उपस्थित होता है, जिसे हम एकात्मकता के वैश्विक संदर्भ के रूप में देख सकते हैं। यह एक आध्यात्मिक अवधारणा है, लेकिन जब हम इसे दर्शनशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य में देखने की कोशिश करेंगे तो यह अद्वैत दर्शन के रूप में हमारे समक्ष प्रस्तुत होगा। अद्वैत दर्शन को धर्म और संप्रदाय की सीमाओं में नहीं बाधा जा सकता, क्योंकि एक अच्छे व्यक्ति में जिन बातों की कल्पना हम कर सकते हैं, वहीं इस दर्शन में है। यह वास्तविक मनुष्य बनाने वाले दर्शन है। यह वैश्विक समरसता की स्थापना करने वाला दर्शन है।

एकात्मता का वैश्विक सन्देश

एकात्मकता के वैश्विक संदर्भ में मैं शंकराचार्य के वेदान्त का सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक पहलू के संदर्भ में उल्लेख करूंगा।इन्होंने भारतवर्ष की एकीकरण के चार प्रतीक देश के कोनों में स्थापित किये – (१) ज्योतिष्पीठ बदरिकाश्रम, (२) श्रृंगेरी पीठ, (३) द्वारिका शारदा पीठ और (४) पुरी गोवर्धन पीठ अगर हम शंकराचार्य के जीवन को देखें तो उनमें हमें सम्पूर्ण भारतीय धर्म, दर्शन और संस्कृति समग्र रूप से परिलक्षित होती है, जो एक सभ्यता दर्शन का आधार प्रस्तुत करती है। यह सभ्यता दर्शन एकता का दर्शन है और यह एकता का दर्शन इस आधार पर टीका है कि जो नश्वर है उसे छोड़ व्यक्ति को उस तत्व को पाने का प्रयास करना चाहिए, जो चिरस्थायी और शांतिप्रदायक हो।

               भारतीय दर्शन के इतिहास में शंकर का स्थान स्थायी भी है और उच्च भी। यद्यपि उन्होंने मौलिकता का कोई दावा अपने लिए स्वीकार नहीं किया है फिर भी मनुष्यों के चित्त में उन्होंने एक क्रांति उत्पन्न कर दी, जिसके हितकारी परिणाम आज दिखाई पड़ रहे हैं। चिन्तन पद्धति और भाष्य लिखने में उन्होंने एक आदर्श स्थापित कर दिया, जिसका अनुसरण करने की चेष्ठा भारत के परवर्ती दार्शनिकों ने भी किया। उनकी रचनाओं की विशिष्टता है-मर्मभेदी अन्तर्दृष्टि और विश्लेषणात्मक नैपुण्य। हमारे वैदिक परंपरा से लेकर आचार्य शंकर तक जो वैचारिक विकास है, उसमें कहीं भी मानव केन्द्रित द्वैतबोध की दृष्टि नहीं मिलेगी  बल्कि‘ईशावस्यमिदं सर्वं’ तथा ‘त्येन त्यक्तेन भुंजीथा’ की दृष्टि मिलेगी। क्योंकि इस प्रकृति पर केवल पुरुष का एकाधिकार नहीं है, बल्कि जड़, जंगम, स्थावर के भी अपने-अपने अधिकार है। अतः यह सर्वसमादर की चराचरवादी दृष्टि है। इस बात को गोस्वामी तुलसीदास के मंगलाचरण से समझा जा सकता है, जब वह कहते है-

‘‘आकर चार लाख चैरासी  जाति, जीव, जल-थल नभवासी’’। यह संपूर्ण चराचर की दृष्टि है, जब वह अपने महाकाव्य की शुरूआत ईश्वर के प्रति प्रार्थना सेे न कर जड़, जीव, जंगम, स्थावर, उद्भिज से करते है।

               यह सभ्यता बोध मनुष्य का मनुष्य से, मनुष्य का प्रकृति से मनुष्य का ईश्वर से द्वैतभाव नहीं रखता है। अतः हमारी सभ्यता अद्वैतबोध के आधार पर निर्मित है।


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