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फ्री-विल – एक पुस्तक समीक्षा

April 18, 2022 Authored by: Dr. Vikas Singh

“पुस्तक समीक्षा-अमेरिकन न्यूरोलॉजिस्ट और दार्शनिक सैम हैरिस द्वारा लिखित मुक्त इच्छा(फ्री-विल)”

सैम हैरिस द्वारा लिखी गयीं एक पुस्तक मुक्त इच्छा को पढने के बाद आये हुए विचारो को आपसे इस छोटे से लेख के द्वारा साझा करने जा रहा हूँ| सात अध्यायों वाली यह पुस्तक मुक्त इच्छा, इच्छा की अवचेतन उत्पत्ति,बदलते हुए विषय, ”चुनाव प्रयास,भावनाए” ,क्या सत्य हमारे लिए बुरा होगा ,नैतिक जिम्मेदारियाँ,राजनीति और निष्कर्ष नामक अध्यायों में बटी है|

पहले अध्याय में लेखक ने स्टेवन हेस और कोमिरेजेवेसकी नाम के दो अपराधियो के विवरण के आधार पर यह मुक्त इच्छा को नकारने की कोशिस की है ये अपराधी २०१५ में संयुक्त राज्य अमेरिका कि कोर्ट में मृत्यु दंड कि सजा पाए हुए हैं जिसे बाद में मृत्यु दंड में बदल दिया गया हाल में उसमे से एक अपराधी ने अपने को ट्रांसजेंडर बनने की गुहार लगाई है|

दूसरे अध्याय में लेखक ने लोगो द्वारा “फ्री विल” में विश्वास का आधार इसके अमूर्तकरण में निहित माना है| तीन दार्शनिक वादों नियतिवाद,उदारवाद और अनुकूलतावाद की स्थिति को प्रस्तुत करते हुए नियतिवादी और उदारवादियो को मुक्त इच्छा का विरोधी कहा है जबकि अनुकूलतावादिओं  को मुक्त इच्छा की अवधारण का समर्थक माना है|  लेखक ने अपने तर्कों का आधार मुख्य रूप से न्यूरोफिजियोलॉजिकल सम्बन्ध को बनाया है चूकि सारी घटनाए फिजियोलॉजिकल हैं और उसका संबंध न्यूरॉन से है| योगियों द्वारा भूख नियन्त्रित करने  जैसी घटना के आधार पर वह भारतीय योगिक परंपरा ‌‍को नकारता हुआ इसे धोखेबाजी कहता है |

कारण और प्रभाव नामक अध्याय में लेखक इतना तक कह जाता है कि हमारी सुबह कि अगली कॉफ़ी मुक्त इच्छा पर निर्भर न होकर न्यूरोट्रांसमीटर पर निर्भर करता है | 

“चुनाव प्रयास,इरादा” नामक अध्याय में डेनिअल द्वारा कि गयी स्वयं की  आलोचना का कारण आलोचक द्वारा निश्चयवाद और भाग्यवाद में अंतर न कर पाने के कारण को बताते हुए खुद को भाग्यवाद से अलग करते हैं | लेखक अलग-अलग परिणामो का कारण भिन्न चुनाव को मानते हैं यदपि लेखक स्वयं के ही मनोवैज्ञानिक व्यवहार को रहस्यमयी बताते हैं कि क्यों उन्होंने आत्मरक्षा के लिए २० वर्ष पूर्व शुरू की गयी ट्रेनिंग को उन्होंने बीच में ही क्यों रोक दिया | 

“क्या सत्य हमारे लिए बुरा होगा” नामक अध्याय में हरिस फ्री विल के न होने से कुछ भी अनुचित नहीं होगा बल्कि इससे वो स्वयं को अधिक करुणावान महसूस करने के साथ साथ सेल्फ डिफेन्स में वो विपरीत भी हो सकते है | 

नैतिक जिम्मेदारी नमक अध्याय में संयुक्त राज्य अमेरिका कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा फ्री विल को सार्वभौमिक मानने और मानव चरित्र को सातत्यपूर्ण समझने के विपरीत कुछ उदाहरण (जैसे ४ वर्षीय बालक द्वारा अपने पिता की हत्या आदि ) देते  हैं और फ्री विल को भ्रम कहने की कोशिश करते हैं  | 

राजनीति नामक अध्याय में वे उदारवादियो और रुढिवादियो को एक ही श्रेणी में रखते हुए वे कहते हैं- फ्री विल का भ्रम न होने से समाज और राजनीति अच्छे तरीके से कार्य कर सकेंगे  |  भूख से न जीत पाने  के अपने सामान्य अनुभव के तर्क को लेखक फ्री विल के न होने के रूप में वर्णित कर पुस्तक को समाप्त करते हैं | 

इस पुस्तक कि प्रस्थापना सामान्य मानवीय व्यवहारों के न्यूरोफिजियोलॉजिकल विश्लेषण पर आधारित है इसलिए जब इसे दर्शनशास्त्र,कानून और समाज के अन्य ढाचों पर लागू किया जाता है तो अतिब्याप्ति दोष है  तथा विशेष के आधार पर सामान्य निष्कर्ष निकलने का प्रयास है | 

फ्री विल की असम्भावना से समाज के भीतर संस्थाओ का गठन कैसे संभव होगा इस विषय पर लेखक मौन है |   इसके अलावा मनुष्य जिम्मेदारी के भाव को महसूस नहीं कर पायेगा और समाज अराजकता कि ओर बढ़ जायेगा अपराधी और सज्जन के बीच का भेद समाप्त होने से लोगो को अपराध कि प्रेरणा मिलेगी |   शोपेन्होवर और नीत्से जैसे दार्शनिको ने फ्री विल को जिस ढंग से रखा उसे लेखक ने एड्रेस न करते हुए सिर्फ अपने कुछ विचार साझा किये हैं .फ्री विल का प्रश्न इसाई धर्मशास्त्रियो द्वारा अशुभ कि समस्या को हल करने के टूल के रूप में भी माना गया था  |  फ्री विल कि क्या कोई यूनिवर्सल धारणा है जिस पर सभी एक मत हैं तो लेखक के द्वारा किया गया यह खंडन भी वस्तुतः ‍ फिजियोन्यूरोलॉजिकल फ्री विल के न होने कि ओर संकेत करता है | 

इसका कारण  हैरिस द्वारा  मनुष्य की कल्पना पर भी आधारित है हरिस के लिए मनुष्य मात्र न्यूरोफिजियोलॉजिकल है  |  मानव के होने का अर्थ क्या होगा यदि मुक्त इच्छा की  सम्भावना न होगी |फ्रॉयड का भी हैरस पर स्पष्ट प्रभाव प्रभाव दिखता है जिसमे अचेतन के आधार पर मनुष्य के स्वरुप को व्याख्या किया गया है| 

 भारतीय दृष्टि से भी  मानव के स्वरुप की  कई अवधारणाये है, मानव का स्वरुप भौतिक  के साथ-साथ अध्यात्मिक भी है |कुछ प्रत्यक्ष है तो कुछ छिपा भी है किन्तु जब हम सामान्य ब्यवहार करते हैं तो वह नाम और रूप से युक्त होता हैं और वह सार्वभौमिक न होकर तात्कालिक होता है यदि हम अपने इस संबंध में विचार न करके सार्वभौमिकता को ही माने तो लोक व्यहवहार नहीं संभव हो पायेगा |

Bibliography:

Sam Harris (2012), Free will, Simon and Schuster.


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