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भारतीय परम्परा की सनातन दृष्टि

April 6, 2022 Authored by: Dr. Amit Kumar Dubey

भारतीय परम्परा में धर्म सत्य और ऋत का संयोग हैI स्वभावतः मनुष्य अतीत, वर्तमान और भविष्य को एकसाथ जीने की कोशिश करता हैI इस परम्परा में अतीत से जुड़ने का अर्थ वर्तमान से पलायन नहीं अपितु वर्तमान की सम्भावना का विस्तार हैI इसी प्रकार भावी सुख की कल्पना अन्य संस्कृतियों की तरह प्रेरक नहीं हैI हिन्दू दृष्टि अनागत को वर्तमान की सन्तति के रूप में ही स्वीकार करती हैI अन्य संस्कृतियों की विश्व-दृष्टि तथा हिन्दू विश्व-दृष्टि में मौलिक भेद हैI कुछ संस्कृतियाँ प्रकृति और मनुष्य की शक्तियों में स्पर्धा समझती हैं तथा उसपर विजय प्राप्त करने के उदेश्य से कार्य करती हैंI इसके विपरीत हिन्दू विश्व-दृष्टि मनुष्य और प्रकृति दोनों को अविलग देखती हैI अर्थात बाहर जो सूर्य का प्रकाश है वही भीतर बुद्धि का प्रकाश है; बाहर जो अंधकार है वही भीतर का भय है; बाहर जो तृण, वीरुध और वृक्ष में ऊपर उठने की प्रक्रिया है, वही भीतर की उमंग हैI इसलिए मनुष्य तथा प्रकृति और देवता में स्पर्धा नहीं सहकार हैI 

          भारतीय ज्ञान परम्परा अनंत विशिष्टताओं से भरी हुई है तथा जीवन के प्रति इसकी अपनी विशिष्ट दृष्टि हैI परम्परा को उसके मूल अर्थ में समझना आज सबसे बड़ी चुनौती हैI परम्परा को समझने के लिए आवश्यक है कि इसे किसी अन्यत्र तरीके से न समझा जायI तात्पर्य यह है कि जो आधुनिक विचार शैली या जिसे वैज्ञानिक शैली भी कहा जाता है, उससे परम्परा की सही समझ विकसित नहीं हो सकती हैI वैज्ञानिक विधा में दो तरीके हैं- एक है विश्लेष्णात्मक तथा दूसरा है ऐतिहासिक या कालक्रमात्मकI एक में किसी विषय-वस्तु को अवयवों में बांटना, विश्लेषण करना फिर सिद्ध करना कि यह इसका संयोग या जोड़-तोड़ हैI दूसरे तरीके में कालक्रम से उसके विकास की अवस्थाओं को समझनाI इसे अंग्रेजी में हम ‘Historical mode of thought’ और ‘Analytical mode of thought’ कहते हैंI विज्ञान अलग-अलग शाखाओं में अपनी खोज करता है और निष्कर्ष निकालता है तथा इसी से आधुनिक चिन्तन प्रभावित होता हैI इस तरह की चिन्तन शैली से हम परम्परा को नहीं समझ सकते क्योंकि यह रिडक्शनिज्म या पराभव का तरीका हैI जहाँ उच्चतर मूल्य (Higher Value) को निम्नतर मूल्य (Lower Value) से समझने की कोशिश की जाती है, चेतना को अचेतन से समझने की कोशिश की जाती हैI यह चेतना को न्यूरोलॉजी के आधार पर समझने की कोशिश की जाती है जो वस्तुतः अपर्याप्त हैI किन्तु इस तरह की विचार प्रक्रिया द्वारा मनुष्य का अपना विमानवीकरण होता हैI यदि हमे परम्परा को समझना है तो परम्परा की विचार शैली समझनी और अपनानी होगीI गीता के पन्द्रहवें अध्याय का एक श्लोक है जो उच्चतर और निम्नतर मूल्य के संदर्भ में है:

  ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।                                  

छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।।

इसका अर्थ है: “ऊपरकी ओर मूलवाले तथा नीचेकी ओर शाखावाले जिस संसाररूप अश्वत्थवृक्षको अव्यय कहते हैं और वेद जिसके पत्ते हैं, उस संसारवृक्षको जो जानता है, वह सम्पूर्ण वेदोंको जाननेवाला है।“ अर्थात मूल जड़ उपर चेतना में है और शाखाएं नीचे जड़ता की ओरI जब हम चेतना से नीचे उतरते हैं अर्थात उच्चतर मूल्य से निम्नतर मूल्य के तरफ तब हमारा स्थान कहाँ है यह भी हमें ठीक से समझना चाहिएI

      भारतीय परम्परा वेदमूलक है किन्तु नितान्त वेदों से निर्मित नहीं हैI उसमे आगम का तंत्र परम्परा का भी महत्वपूर्ण स्थान हैI अर्थात, आगम तथा निगम दोनों मिलकर पूरी भारतीय परम्परा का निर्माण करते हैं जिसमें इसकी जटिलता सम्पूर्णता के साथ निहित हैI प्रत्येक परम्परा में तीन दृष्टियाँ होती हैं- प्रथम उसकी विश्व-दृष्टि क्या है, द्वितीय उसकी समाज-दृष्टि क्या है, तृतीय उसकी जीवन-दृष्टि क्या है? यदि यह तीनों दृष्टियाँ किसी परम्परा में हों तो वह सम्पूर्ण परम्परा कहलाती हैI जैन और बौद्ध-दर्शन में जीवन-दृष्टि पर मुख्य जोर हैI वैदिक और तांत्रिक परम्पराओं में विश्व-दृष्टि पर अधिक जोर हैI सामाजिक दृष्टि पर केवल वैदिक परम्परा में जोर हैI इन तीनों दृष्टियों से मिलकर ही कुछ मूलभूत बातें बनती हैंI वैदिक परम्परा की दो पूर्वमान्यताएं हैं- प्रथम यह कि सत्य पूर्ण है तथा दूसरी यह कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ऋत से अनुशासित हैI सत्य और ऋत यह दर्शाते हैं कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एक क्रमबद्ध व्यवस्था हैI अतः परम्परा या संस्कृति के बारे में विचार-विमर्श से पूर्व यह समझ लेना आवश्यक है कि संस्कृति केवल मूल्य-दृष्टि नहीं अपितु मूल्य-निष्ठा भी हैI वह विचार मात्र नहीं अपितु विश्वास और आचरण भी हैI हमारी परम्परा में चेतना के विकास का अर्थ विचार का ही नहीं, अनुभूति का विकास भी हैI परम्परा का यह अटूट विश्वास है कि यदि जीवन किन्हीं मूल्यों की ओर उन्मुख और अनुप्राणित है तो उसके प्रत्येक पक्ष में उन्हीं मूल्यों की अनुप्रेरणा प्रतिबिम्बित होनी चाहिएI क्योंकि संस्कृति सम्पूर्ण जीवन के गुणात्मक उत्कर्ष की प्रक्रिया हैI संस्कृति मूल्य-दृष्टि और मूल्य-निष्ठा होने के साथ-साथ मूल्यों के अर्जित करने की प्रक्रिया भी हैI यह भारतीय परम्परा की मूल-दृष्टि हैI  


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