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तंत्र १ : भारत – एक आध्यात्मिक संस्कृति

September 28, 2020 Authored by: Rajnish Mishra

विश्व में कई संस्कृतियाँ हैं, मैं सिर्फ तीन का उल्लेख यहाँ करना चाहूंगा। एक यूनान की संस्कृति, दूसरी चीन की और तीसरी भारत की। इन तीन संस्कृतियों के अपने अलग अलग प्रस्थान हैं। जैसे प्राचीन ग्रीस। आधुनिक ग्रीस की चर्चा मैं नहीं करना चाहता हूँ, जो कि प्राचीन ग्रीस से बहुत भिन्न है । इसिलिये मैं जिस ग्रीस की चर्चा करूंगा वो पेगन ग्रीस है, जिसमें प्लेटो, एरिस्टोटल और सुकरात हैं।

वह एक बुद्धि केन्द्रित संस्कृति है। बुद्धि केन्द्रित सभ्यता है। ग्रीक किसी भी बात को केवल पहले से कही गयी है, अथवा किसी विद्वान के द्वारा कही गयी है, अथवा किसी शास्त्र में उल्लिखित है, इस रूप में उसे स्वीकार नहीं करते। उस पर वह वाद करते हैं, चर्चा करते हैं, डिबेट करते हैं, और अंततः, जो बात स्थापित होती है, सिर्फ उसी को वो ग्रहण करते हैं। इस अर्थ में ग्रीक कल्चर ने फलसफा जैसी विधा विकसित की, और वो स्वयं ही कहते हैं, कि इस शब्द का किसी भी बर्बरीक भाषा में अनुवाद संभव नहीं है।

दूसरी संस्कृति है, बड़ी महत्वपूर्ण और शक्तिशाली संस्कृति है चाइना की, वह एथिक्स बेस्ड संस्कृति है। कांफुशियस, लाओत्से, आदि आचार्यों के दर्शन से यह बात प्रमाणित हो जाती है।

परन्तु भारतीय संस्कृति की चर्चा जब हम करते हैं, तो हम पाते हैं, कि यह एक आध्यात्मिक संस्कृति है।

ऐसा लगता है इस शब्द को सुनने से कि इस लोक में उसकी दूसरी कोई गति नहीं है, या इस लोक की इस संस्कृति को कोई समझ नहीं है। बात यह नहीं है। इस संस्कृति में आध्यात्मिक शब्द का अर्थ है, अधि-आत्म – आत्मा पर केन्द्रित और आधारित। हमारी संस्कृति पूछती है कि हम सब कुछ जानते हैं, लेकिन स्वयं को कितना जानते हैं?

स्वयं को जानना भी तो सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। जिससे सब कुछ जाना जाता है, वह क्या है? उपनिषद् में एक प्रश्न आता है और मैं नहीं समझता कि किसी भी दूसरी संस्कृति में इस कोटि का प्रश्न पूछा गया है। आचार्य से यह पूछा जाता है कि ऐसा कौनसा ज्ञान है जिसको प्राप्त करने के बाद कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता, सब कुछ ज्ञात हो जाता है। ऐसे प्रश्न सरल भले ही लगते हों, पर यह ऐसी संस्कृति से निकले हुए प्रश्न हैं, जो आध्यात्मिक ज्ञानमूलक संस्कृति है।

ज्ञान अथवा ज्ञान का स्वरुप कोई बाह्य वास्तु नहीं है। आचार्य अभिनवगुप्त का उल्लेख मैं यहाँ करना चाहूँगा जो कि कश्मीर के बहुत बड़े आचार्य रहे हैं। उनका ग्रन्थ बहुत विस्तृत ग्रन्थ है, तन्त्रालोक । वे प्रतिभिज्ञा शब्द की परिभाषा देते हुए कहते हैं कि यह अपनी तरह ऐसा ज्ञान है जो हमारे अपने स्वरुप को उद्घाटित करता है, हमें स्वयं में स्थित करता है, अर्थात हमें स्वस्थ करता है। यह बड़ा अच्छा शब्द है। स्व में स्थित करने वाला। इसका अर्थ स्वस्थ होना नहीं है। ऐसा ज्ञान इस संस्कृति की विशेषता रही है।

इस संस्कृति के दो बड़े महत्वपूर्ण स्वरुप हैं। एक आगम और दूसरा निगम। निगम की बहुत प्रसिद्ध संज्ञा है – वेद। आगम की ही एक अपर संज्ञा है – तंत्र। तंत्र और आगम, समानार्थी अर्थों में हमारे शास्त्रों में प्रयुक्त होते रहे हैं।

इस आगम मूलक संस्कृति में विज्ञान, धर्म और दर्शन, ये तीनों लगभग समानार्थी हैं। मैं एक उदाहरण दे कर इसको स्पष्ट करता हूँ कि जैसे बौद्ध धर्म दर्शन ही है। हमारे यहाँ धर्म, दर्शन और विज्ञान इनका कोई प्राथक्य नहीं है, क्योंकि धर्म न तो अदार्शनिक है न तो अवैज्ञानिक है। उसी प्रकार से जैसे विज्ञान न तो अदार्शानिक है, और न तो अधार्मिक है, और जीवन के व्यापक स्तर पर इसकी समझ है।

जिस संपूर्ण उन्नति की हम चर्चा करते हैं वह सब कुछ इस धर्म के अंतर्गत समाहित हो जाता है। और एक अंतर है फलसफा का अपने दर्शन से। भारतीय दर्शन आध्यात्म केन्द्रित तो है ही पर प्रश्न भी इस तरह के उपस्थित किये गए हैं जो हमें प्रेरित करें स्वयं को जानने के लिए। प्रायः सभी दर्शनों के साथ, धर्म और उपासना की पद्धति, साधना की पद्धति से जुडी हुई थी।

जैसे बौद्ध साधना पद्धति है। शैव धर्म दर्शन है और साधन पद्धति भी है। शाक्य धर्म है, दर्शन है, साधना पद्धति भी है। हमारे यहाँ उपनिषदों में विद्याओं का उल्लेख जब किया गया तो परा और अपरा दो प्रकार की विद्याएँ बतायी गयीं। और अपरा के अंतर्गत जितने भी शास्त्र हैं, वे सब परिगणित हैं – वेद, उपनिषद्, ब्राह्मण, अरण्यक सभी।

और विशेष बात यह है कि परा विद्या का कोई शास्त्र नहीं। क्यूंकि परा अनुभूति गम्य है, अनुभूति परक है। इन सभी अपरा विद्याओं का महत्त्व कम नहीं है, क्यूंकि जब प्रश्न किया जाता है, तो उसका उत्तर दिया जाता है कि ये दोनों ही विद्याएँ जानने योग्य हैं, अपरा कोई तुच्छ विद्या नहीं है। और यह कोई वर्टीकल क्लासिफिकेशन नहीं है, कि परा ऊपर और अपरा नीचे है। यह हॉरिजॉन्टल क्लासिफिकेशन है।

तो ऐसी स्थिति में दोनों ही विद्याएँ जानने योग्य हैं। अपरा का महत्त्व यह है कि इसे पर्यवसित होना चाहिए परा में अनुभूति में। अन्यथा यह एक अवरोध मात्र है, और त्याज्य है। जो कुछ भी जो हम सीखते जानते हैं, वह इस रूप में उस ज्ञान या अनुभूति का ही निषेध कर देता है।

Centre For Indic studies
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