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बौद्ध मत की हिन्दू धर्म के साथ एकात्मकता

August 10, 2020 Authored by: Saurav Shukla

किसी दूसरे के प्रकाश में तो एक पशु भी रह लेता है, किन्तु जो स्वयं दीप बनकर समस्त जग को प्रकाशित करे वह बुद्ध होता है। 14वें और वर्तमान दलाई लामा तेनजिन ग्यास्त्सो कहते हैं कि “बुद्ध वह है जो सभी भ्रमों और अविद्याओं से मुक्त है, जो सभी सज्जन गुणों से सुशोभित है, जिसने अज्ञान के समस्त अन्धकार को समाप्त कर लिया है, और ज्ञान को प्राप्त हो गया है।”

महात्मा  बुद्ध का जन्म छठवी शताब्दी ई.पू. में वैशाख मास की पूर्णिमा तिथि को लुम्बिनी में एक सनातनी (हिन्दू) परिवार में हुआ था। जैसा कि हम सबने बचपन में ही कथा सुनी है, एक साधु द्रष्टा ने उनके विषय में भविष्यवाणी की थी कि “बच्चा या तो महान राजा या एक महान पवित्र पथ-प्रदर्शक बनेगा।” बालक का नाम सिद्धार्थ रखा गया। सिद्धार्थ यानि वह जो सिद्धि प्राप्त करने के लिए जन्मा हो। जैसे कि सनातन धर्म में उत्कट विरागी और मुमुक्षुओं के लिए अन्य आश्रमों से पूर्व भी संन्यास का विधान स्वीकृत है, उसके अनुसार संन्यासी सब कुछ, यहाँ तक कि वैदिक कर्मकांड भी, त्यागकर संन्यास ग्रहण कर लेता है। बुद्ध ने भी मुक्ति के लिए गृह एवं राजपाट त्यागकर सनातन हिन्दू धर्म की प्राचीन काल से प्रतिष्ठित संन्यास की परम्परा का ही पालन किया था। बुद्ध ने सगौरव स्वयं को पूर्व परम्परा के ही अनुयायी के रूप में ख्यापित किया है। बुद्ध ने इसका उल्लेख भी किया है कि वह महान मनु और राजा रामचंद्र के वंशज हैं।

भारत के सामान्य जन की चिति में बुद्ध के लिए बहुत ही गहरी श्रद्धा विद्यमान है। ऐसी मान्यता है कि बुद्ध भगवान् विष्णु के नौवें अवतार थे। तमिलनाडू में एक बहुत ही प्रसिद्ध स्थान है महाबलीपुरम, जहाँ उत्खनन में भगवान विष्णु का 8वीं शताब्दी में निर्मित मंदिर पाया गया है। उसकी दीवार पर बुद्ध को भगवान् विष्णु का नौवाँ अवतार बताता हुआ महाभारत का एक श्लोक अङ्कित है –  

मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नारसिंहश्च वामनः।

रामो रामश्च रामश्च बुद्धः कल्किश्च ते दश॥”

इसके साथ-साथ गुजरात, मध्यक्षेत्र और अन्य स्थान जहाँ भी वासुदेव और 10 अवतारों की मूर्तियाँ विद्यमान हैं, उनमें बुद्ध नौवें अवतार के रूप में प्रतिष्ठित हैं। प्रत्येक हिन्दू पूजा अनुष्ठान में संकल्प मंत्र पढ़ने की बहुत ही आवश्यक परम्परा है। संकल्प मंत्र में भी वर्तमान कालखण्ड को निर्दिष्ट करने के लिए हमेशा कहा जाता है बौध्द अवतारे अर्थात् “बौद्ध अवतार (के समय) में”। 

बौद्ध मत की महायान शाखा में अनेक हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा बौद्ध करते हैं । थाईलैंड के राजा, जो कि पूर्ण रूप से बौद्ध हैं, वहाँ बौद्ध मंदिर में पूजा करने से पहले हिन्दू मंदिर में पूजा करते हैं जिसमें विष्णु, ब्रह्मा, श्री राम, शिव और अन्यान्य देवी देवताओं की पूजा की जाती है। दिसम्बर माह में राजा हनुमत् वन्दना भी करते हैं । श्रीलंका, जो कि पूरी तरह एक बौद्ध देश है, वहाँ के शहर में एक बहुत ही सुन्दर मंदिर है “गंगाराम“ जो कि एक बौद्ध मंदिर है। मंदिर में श्री हरि नारायण और देवी लक्ष्मी की मूर्ति विराजित है, और बौद्ध उनकी पूजा अर्चना करते हैं ।

जो भी बौद्ध मंदिर निर्मित हुए, उनके निर्माण में हिन्दू वास्तुशास्त्र का ही प्रयोग किया गया है। जो भी बौद्ध मन्त्र हैं उनकी रचना हिन्दू मन्त्रों की तरह हुई है। जब भारत से बाहर बौद्ध मत पहुँचा तो, बौद्ध मत के साथ तिब्बत, चीन, और जापान में हिन्दू देवता 12 आदित्य भी पहुँचे और वहाँ इन देवताओं के मन्दिरों का निर्माण हुआ, जो बौद्धों ने ही किया। वर्तमान दलाई लामा ने हिन्दू-बौद्ध की एकात्मता का सत्य बताते हुए कहा है कि “हिन्दू, बौद्धों के आध्यात्मिक रूप से बड़े भाई हैं

किन्तु नेहरुवी राज्यतन्त्र के छद्म-सेकुलरवादी वामपन्थी इतिहासकारों ने बौद्ध मत को हिन्दू धर्म (जो कि बौद्ध मत से प्राचीन है) के विरुद्ध एक आन्दोलन बताया। जब कि सत्य यह है कि बौद्ध मत, सनातन हिन्दू धर्म की उन अनेकों आध्यत्मिक शाखाओं में से एक शाखा है, जो अलग-अलग समय में सत्य के प्रचार और अनुभूति के लिए माध्यम के तौर पर आर्यजनों एवं साधुओं-सन्यासियों, द्वारा विकसित की जाती रहीं हैं। जिस तरह वैष्णव, शैव, शाक्त और उदासीन आदि अलग-अलग मत सनातन से विकसित हुए हैं वैसे ही बौद्ध भी एक मत विकसित हुआ है।

बुद्ध स्वयं हिन्दू परिवार में जन्मे, उन्होंने कई गुरुओं से शिक्षा ग्रहण की एवं अपनी “विपस्सना” पद्धति को विकसित किया। बौद्ध मत का दर्शन उपनिषदों से प्रभावित है, बौद्ध मत का तर्कशास्त्र गौतम मुनि के न्याय दर्शन को आधार बनाकर विकसित किया गया है, बौद्ध मत की ध्यान विधियाँ एवं अन्य क्रियाएँ सांख्य-योग की प्राचीन परम्परा से निकली हुई हैं । गीता में जिन ज्ञान योग, कर्म योग ,प्रेम योग एवं राज योग की अवधारणा है, बुद्ध मत पूरी तरह इन सबसे प्रभावित है। बौद्ध मत भी आस्तिक मतों की तरह ही कर्म सिद्धान्त में विश्वास रखता है। बौद्ध मत में पूजे जाने वाले देवी देवता भी वही हैं जिनकी उपासना हिन्दू परम्परा में होती आई है। यहाँ तक कि जापान के हर कसबे में पूजी जाने वाली नदियों की देवी बेन्ज़ितें, वस्तुतः देवी सरस्वती हैं। उन्हें जापान में हिन्दू नहीं बल्कि बौद्ध लेकर गए थे। बौद्ध मत में जो साधना के लिए तन्त्र विकसित हुआ है, वह वह तन्त्र की प्राचीन हिन्दू परम्परा से ही उद्भूत एवं प्रभावित है। ज्योतिष तथा काल की गणना एवं विभाजन में भी बौद्ध परम्परा में प्राचीन सनातन परम्परा का यथावत पालन होता है।

जब विश्व हिन्दू परिषद् की स्थापना हुई और पहले अध्यक्ष स्वामी चिन्मयानन्द बने तब संस्थापक सदस्यों में से एक दलाई लामा भी थे । स्वतन्त्र भारत में डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर द्वारा जब हिन्दू विवाह अधिनियम १९५५ बनाया गया तब उस अधिनियम में बौद्ध मत को हिन्दू धर्म की एकात्म शाखा के रूप में ही स्वीकार किया गया ।

बौद्ध इतिहास में एक कथा आती है कि एक बार मगध के एक मंत्री भगवान बुद्ध के पास पहुँचे और उनसे लोकतांत्रिक गणराज्य को सशक्त करने के विषय में पूछा। तब उत्तर में भगवान बुद्ध ने कहा : “प्राचीन नियम एवं परम्पराओं से बँधे रहो, तीर्थ स्थानों का रक्षण करो , प्राचीन परम्पराओं का मान-सम्मान करो”। उस समय जो कुछ भी प्राचीन था और जो कुछ भी परम्परा थी सब सनातनी हिन्दू थी। अगर बुद्ध हिन्दू धर्म विरोधी होते तो ऐसा क्यों कहते?

वामपन्थियों ने भारतीय समाज में यह भी भ्रम फैलाया कि भारत में बौद्ध मत के अप्रभावी होने का कारण यह रहा कि हिंसक और कट्टर हिन्दुओं ने, अहिंसक बौद्धमतावलम्बियों पर अत्याचार एवं हिंसा की। वामपन्थियों द्वारा गढ़ी गई इस झूठी अवधारणा को उल्लेखनीय इतिहासकार विन्सेंट स्मिथ ने अपनी पुस्तक “द अर्ली हिस्ट्री ऑफ़ इण्डिया” में यह कह कर नकारा है : “Until lately the assumption commonly was made that Buddhism had been extinguished by a storm of Brahmin persecution. That is not the true explanation.” (Page 368)   लेकिन इस झूठ को यदि किसी ने अपने कड़े शब्दों में पूरी तरह नकार दिया है तो वह हैं डॉ. बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर। उनके अनुसार, “There can be no doubt that the fall of Buddhism in India was due to the invasions of the Musalmans. Islam came out as the enemy of the ‘But’. The word ‘But’ as everybody knows, is the Arabic word and means an idol. Thus the origin of the word indicates that in the Moslem mind idol worship had come to be identified with the Religion of the Buddha. To the Muslims, they were one and the same thing. The mission to break the idols thus became the mission to destroy Buddhism. Islam destroyed Buddhism not only in India but wherever it went. Before Islam came into being Buddhism was the religion of Bactria, Parthia, Afghanistan, Gandhar, and Chinese Turkestan, as it was of the whole of Asia. In all these countries Islam destroyed Buddhism.” (सन्दर्भ: Dr. Babasaheb Ambedkar: Writings and Speeches, Vol. III, Government of Maharashtra. 1987, p. 229)

बाबा साहेब की बात को आगे बढाते हुए और अंत में मुस्लिम सेनाओं द्वारा किए गए बौद्धों पर अत्याचार को और विस्तृत रूप से समझने के लिए कोएनराड एल्स्ट को शब्दशः उद्धृत करना आवश्यक है: “In Central Asia, Islam had wiped out Buddhism together with Nestorianism, Zoroastrianism, Manicheism, and whatever other religion it encountered. The Persian word for idol is but, from Buddha, because the Buddhists with their Buddha-statues were considered as the idol-worshippers par excellence. The Buddhists drew the wrath of every Muslim but-shikan (idol-breaker), even where they had not offered resistance aganinst the Muslim armies because of their doctrine of non-violence. As a reminder of the Buddhist past of Central Asia, the city name Bukhara is nothing but a corruption of vihara, i.e. a Buddhist monastery; other Indian names include Samarkhand and Takshakhand, i.e. Tashkent. In India, Buddhism was a much easier target than other sects and traditions, because it was completely centralized around the monasteries. Once the monasteries destroyed and the monks killed, the Buddhist community had lost its backbone and was helpless before the pressure to convert to Islam (as happened on a large scale in East Bengal).” (सन्दर्भ: Koenraad Elst, “Negationism in India: Concealing the record of Islam” 1992.)

Centre For Indic studies
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