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आधुनिक मन के रूपांतरण में ध्यान की भूमिका

February 4, 2022 Authored by: Dr. Amit Kumar Dubey

राबर्ट राईट आधुनिक विज्ञानों के अच्छे अध्येता तथा लेखक हैंI इनकी पृष्ठभूमि भी नास्तिक है अर्थात किसी धार्मिक विश्वास से जुड़े नहीं हैंI  इनकी कई पुस्तकें इस विषय पर प्रकाशित हो चुकी हैंI उन्हीं पुस्तकों में एक पुस्तक, जिसका शीर्षक है: “व्हाई बुद्धिज़्म इज ट्रू” मेरे इस लेख का विषय हैI इस पुस्तक में राबर्ट राईट ने ध्यान के साथ-साथ क्रमिक-विकास विज्ञान, जीव-विज्ञान, मनोविज्ञान के सिद्धांतो पर बौद्ध-दर्शन के सिद्धांतो को परखने की कोशिश की हैI लेखक का दावा है कि जो कुछ भी वह बौद्ध-दर्शन के बारे में कह रहा है वह ध्यान के दौरान हुई उसकी अनुभूतियों का हिस्सा हैI इसलिए मेरे इस लेख का विषय पूरी पुस्तक की समीक्षा न होकर उन प्रमुख सिद्धांतो का अवलोकन है जो जगह-जगह इस पुस्तक में उपस्थित हुए हैंI वस्तुतः पुस्तक का मूल भाव भी यही है इसलिए इसे समीक्षा भी समझा जा सकता हैI एक ऐसा भी वाकया है जहाँ अपनी अनुभूतियों को अभियक्त करने में बौध-दर्शन के सिद्धांतो की जगह वेदांत अधिक स्पष्ट और करीब हैI हालांकि, राबर्ट इन दोनों सिद्धांतो में कोई बड़ा भेद नहीं मानते बस कहने का तरीका पृथक समझते हैंI जिसे हम इस लेख में और बेहतर ढंग से समझने की कोशिश करेंगे I

इस पुस्तक का आरम्भ राबर्ट राईट ने ‘द मैट्रिक्स’ फिल्म के एक दृश्य से किया हैI जिसमें निओ नाम के किरदार को आभास होता है कि वह स्वप्न की दुनिया में पहुँच गया हैI उसी स्वप्न में कुछ विद्रोही और उनका नेता मोरफस भी पहुँच जाते हैंI वह निओ से कहता है कि ‘दूसरों की तरह तुम भी गुलाम हो, तुम ऐसी कैद में हो जहाँ न तुम्हें स्वाद मिलेगा न तुम देख सकते हो और न ही तुम कुछ छू सकते हो क्योंकि तुम अपने मस्तिष्क के गुलाम होI’ इसी कैद को मैट्रिक्स कहा गया हैI अब निओ को दो विकल्प दिए जाते हैं- एक लाल गोली तथा दूसरी नीली गोलीI यदि निओ नीली गोली लेगा तो वह वापस स्वप्न में चला जायेगा किन्तु यदि लाल गोली लेगा तो उस भ्रम के जाल को तोड़ सकेगाI निओ ने लाल गोली लेना पसंद कियाI राबर्ट कहते ऐसे ही हमें इस संसार में विकल्प मिले हैं और मैंने भी लाल गोली चुनीI यहाँ लाल गोली का तात्पर्य ध्यान(विपश्यना) से हैI राबर्ट राईट कहते हैं, प्राकृतिक चयन के सिद्धांत और मनोविज्ञान के कुछ सिद्धांत दर्शाते हैं कि मनुष्य के मस्तिष्क की बनावट ऐसी है कि वह तार्किक और बौधिक फैसले नहीं ले सकता है तथा मनुष्य अपने वश में रखता हैI उनका मानना है कि जो विचार, धारणा तथा भावनाएं हमें चलाती हैं वो वस्तुतः सत्य के वास्तविक स्वभाव की झलक नहीं देती हैI क्योंकि विचार, धारणा और भावनाएं हमें संतति से भी प्राप्त होती हैI इनका स्वभाव भी भ्रम पैदा करने का हैI मनुष्य का अधिकतर व्यव्हार आंनद और सुख पाने की इच्छा से संचालित होता है किन्तु ऐसा होता नहीं कि किसी एक चीज़ को पाने के बाद वहीं इन्द्रियां संतुष्ट हो जाएँ I बुद्ध के एक महत्वपूर्ण संदेश में यह भी है कि सुख की चाह से जो कुछ हम करते हैं वह वहीं खत्म नहीं हो जाता अपितु उसकी प्यास और बढ़ जाती हैI प्राकृतिक चयन का सिद्धांत भी यही कहता है कि सुख के चाह की बनावट ऐसी है कि असंतुष्टि होगी और फिर उसके बाद सुख के खोज की एक अंतहीन प्रक्रिया बनी रहेगीI आधुनिक अध्ययन भी यह बताते हैं कि हमारी भावनाएं इस तरह से निर्मित हैं कि वास्तविकता का चित्रण नहीं करती हैंI

राबर्ट राईट की यात्रा विपश्यना के एक रिट्रीट से आरम्भ होती हैI उस रिट्रीट के दौरान जो उनको अनुभूतियाँ होती हैं उन्ही के माध्यम से वो बौद्ध दर्शन के सिद्धांतों तक पहुँचते हैंI आरम्भ में वे बहुत संघर्ष करते हैं किन्तु धीरे-धीरे उनको कुछ अनुभूति होती हैI राबर्ट को पहली बार चाकलेट और काफी का स्वाद भी बहुत कर्कश लगने लगता है जबकि ये दोनों चीजें उन्हें बहुत पसंद थींI वो एक घटना का जिक्र करते हैं कि एकबार मैंने रिट्रीट से ही अपनी पत्नी को फ़ोन किया और उसने बताया कि मेरे बात करने का अंदाज बिलकुल बदला हुआ था जो उसे बहुत पसंद आयाI इस रिट्रीट में पहले अपनी साँसो पर ध्यान करने के लिए कहा जाता है, क्योंकि मस्तिष्क को उसकी आदतों से विमुख होने के लिए किसी ऐसी वस्तु की जरूरत पड़ती है जिसपर वह ध्यान कर सकेI यह जो ध्यान की वस्तु है, यह अलग-अलग परम्परा में भिन्न हो सकती हैं जैसे- कोई मंत्र, कोई काल्पनिक चित्र, कोई संगीत या नाद इत्यादिI विपश्यना में सामान्यतः अपनी सांसों पर ही अपने मस्तिष्क को केन्द्रित किया जाता हैI राबर्ट ये कहते हैं कि बौद्ध दर्शन में स्मृति और समाधी ही मुख्य हैं जिससे अष्टांगिक मार्ग का निर्माण होता हैI बौद्ध दर्शन में स्मृति शब्द का तात्पर्य है ‘चित्त में एकाग्रता का भाव’I राईट का मानना है कि अष्टांगिक मार्ग एक-दूसरे पर परस्पर निर्भर हैं तथा इनके क्रम भी ऐसे नहीं समझे जा सकतेI वे कहते हैं कि सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प तथा सम्यक वाक् पहले हो जायें और फिर सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि पर आप पकड़ बनायेंगे ऐसा नहीं हैI इनका मनना है कि सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि ही बौद्ध दर्शन के प्रमुख पक्ष ‘सम्यक दृष्टि’ को मजबूती प्रदान करते हैंI

   एक बात मैं स्पष्ट कर दूं कि यहां जिस बौद्ध दर्शन की बात हो रही है वह पश्चिमी दुनिया द्वारा समझा गया बुद्धिज़्म है। एकाग्र ध्यान एक ऐसी विधा है जिसमें मनुष्य धीरे धीरे संवेदनशील होता जाता है। इस ध्यान के माध्यम से आप मैट्रिक्स जैसी भूल-भुलैया से ‌बाहर आ सकते हैं। राईट कहते हैं कि मैंने बुद्धत्व का कोई महल तो नहीं देखा किन्तु कुछ खंड अवश्य देखें हैं। विपश्यना एक ऐसी ध्यान विधा है जिसमें मनुष्य को एक स्पष्ट अंतर्दृष्टि मिलती है। यह अंतर्दृष्टि सत्य के वास्तविक स्वरूप को देखने में मदद करती है। यही बात बौद्ध ग्रंथों में भी हजारों वर्षों से कही जा रही है। उन्होंने विपश्यना को ऐसे परिभाषित किया है कि अस्तित्व के तीन चिन्हों को समझने में समर्थ बनाता है। जिसमें प्रथम है-क्षणिकवाद दूसरा-दुःख तथा तीसरा- अनात्मवाद। बौद्ध सिद्धांत के अनुसार अनात्मवाद बहुत महत्वपूर्ण है किन्तु विपश्यना के अनुसार सत्य को स्पष्ट रूप से देखना महत्वपूर्ण है क्योंकि यही बुद्धत्व के तरफ जाने का मार्ग है। राबर्ट का आग्रह है कि अनात्मवाद को समझने के लिए ध्यान करना आवश्यक है यदि सिर्फ बौद्धिकता से सिद्धांत को समझने की कोशिश करेंगे तो यह बहुत मुश्किल है। सिद्धांतों को अमूर्त रुप से समझने की कोशिश करना और ध्यान की अनुभूतियों के माध्यम से समझना दोनों अलग-अलग बातें हैं। बुद्धिज्म के अनुसार अनात्म की गहरी अनुभूति आपको बहुत से विषयों में इसका आभास कराती है। राईट के अनुसार दिनप्रतिदिन  ध्यान के अभ्यास में इसका थोड़ा सा अनुभव भी होता है। बुद्ध ने सन्यासियों से संवाद करने की यही तकनीकी अपनायी है,  जिससे वे आत्मा की पुरानी धारणाओं को छोड़कर स्वयं साधना के माध्यम से देखने की कोशिश करें। इसलिए उन्होंने ऐसे प्रश्न रखे कि आत्मा क्या है? यह भौतिक शरीर, मूल भावनाएं, दृष्टि, मानसिक कोटियां अथवा चेतना इनमें से किसे आत्मा कहेंगे? इस पूरे प्रश्न का तात्पर्य यह है कि वो क्या गुण हैं! जिन्हें आत्मा का गुण कहा जा सकता हैI

  अब राईट यह कह रहे हैं कि यह शरीर वास्तव में हमारे नियंत्रण में नहीं है। अर्थात जिन तत्वों से मानव शरीर बना है उसका नियंत्रण उसके हाथ में नहीं है। इसलिए जब बुद्ध कह रहे हैं कि यह शारीरिक आकार आत्मा नहीं है इसका अर्थ है हम शरीर नहीं हैं। उसी तरह यदि भावनाएं आत्मा होतीं तो वो हमें पीड़ा की तरफ नहीं ले जातीं। इस तरीके से वे एक-एक करके इनका निषेध करते हैं। राईट कह रहे हैं कि बुद्ध आत्मा का पूर्णतः निषेध नहीं कर रहे हैं अपितु उसे  परिभाषित नहीं करना चाहते हैं। क्योंकि जब हम हमारा अस्तित्व ही नहीं है तब हम कैसे कह सकते हैं कि हम बहुत सारे अवयवों के समुच्चय हैं। निषेध की भाषा भी बता रही है कि ‘मैं यह नहीं हूं! मैं ये नहीं हूं’ इसमें कौन है जो नकार रहा है? इसकी एक झलक निर्वाण प्राप्त कर लेने वाले मनुष्य की व्याख्या में भी दिखती है, जैसे निर्वाण को उपलब्ध हुआ मनुष्य मुक्त, स्थिर, तृप्त तथा शांत होता है। आसक्ति से निर्मित बुद्धि तथा व्यवहार-केंद्र को ‌बुद्ध आत्मा नहीं कहना चाहते।

      जैसा कि आप जानते हैं यह राबर्ट राईट की निजी आंतरिक यात्रा है जिसमें हो रही अनुभूतियों के माध्यम से वो धीरेधीरे आगे बढ़ रहे हैं। अब राईट आधुनिक विज्ञान के अध्ययनों से यह समझने की कोशिश करते हैं कि क्या जिसे हम सेल्फ या मस्तिष्क समझते हैं, उसका वास्तव में कोई अस्तित्व है? क्या हमारे भीतर ऐसा कोई केन्द्र है जो हमारे सारे निर्णय लेता है? क्या हमारे सभी निर्णय तार्किक आधार पर होते हैं? ‘स्पलीटब्रेनप्रयोग की चर्चा करते हुए कहते हैं कि यह कहना ठीक ही है कि हमारे मस्तिष्क में स्वयं को भ्रमित करने की क्षमता है। इसी तरह से कुछ मनोवैज्ञानिक अध्ययनों की चर्चा के माध्यम से भी वह यही निष्कर्ष निकालते हैं कि यद्यपि हमें लगता है कि हम अपनी फिल्म के निर्देशक हैं किन्तु वास्तव में हम मात्र फिल्म के दर्शक की भूमिका में हैं। प्राकृतिक चयन के सिद्धांत का भी कहना है कि मनुष्य को अपनी कहानी में स्वयं को बौद्धिक, जागरूक और अभिनेता बताना ही ठीक है किन्तु ऐसा है नहीं। राईट कहते हैं कि जो मानसिक प्रत्यय हमारे भीतर बनते हैं वो स्थायी नहीं अपितु क्षणिक होते हैं। ये हमारे निर्णयों को प्रभावित भी करते हैं। इस आधार पर राईटबुद्धिज्म के क्षणिकवाद को भी सही ठहराते हैं। क्योंकि इन मानसिक प्रत्ययों की सक्रियता का बड़ा कारण हमारी भावनाएं होती हैं कि हमारी बुद्धि। बुद्धि भी अपने अनासक्त सिद्धांत के माध्यम से यही कहने की कोशिश करते हैं। जो भाव जिस समय प्रभावी होता है आपके मस्तिष्क के उन्हीं तरह के प्रत्ययों को सक्रिय करता है और हम उस समय उसी के वशीभूत कार्य करते हैं। राईट का यह अनुभव है कि इस बात को ध्यान के माध्यम से समझा जा सकता है तथा इस तरह के व्यवहार से बचा भी जा सकता है। इसी तरह धीरेधीरे राईट अपने अनुभवों तथा आधुनिक विज्ञान के अध्ययनों के माध्यम से एक ऐसे निष्कर्ष पर पहुंचते हैं जहां उन्हें यह आभास होता है कि जिसे वह अब तक कोई केन्द्र या आत्मा समझते थे जो सभी निर्णय लेता है ऐसा कुछ है नहीं। राबर्ट इसे ही बुद्धिज्म का अनात्मवाद कहते हैं।

     राईट अब अपने अगले बड़े अनुभव के बारे में बात करते हैं। जिसे उन्होंने ने नाम दिया है ‘निराकार से साक्षात्कार’। इसकी सबसे मूल बात यह है कि संसार को जैसा है वैसा हम समझ नहीं रहे हैं बल्कि हम अपना संसार स्वयं निर्मित कर रहे हैं। बौद्ध दर्शन का एक बड़ा महत्वपूर्ण सिद्धांत है कि हम किसी वस्तु को वह जैसी है, उसे उसके वास्तविक स्वरूप में नहीं देखते अपितु हम उसे अपनी समझ के अनुसार उसे निर्मित कर देते हैं। क्योंकि हमारे मन में जो धारणाएं पहले से ही विद्यमान हैं उसे हम थोप देते हैं। इसलिए बौद्ध दर्शन में निर्विकल्प प्रत्यक्ष की बात होती है। निर्विकल्प प्रत्यक्ष वह संवेदना है जो हमारी मन की पूर्ववत धारणाओं, संकल्पनाओं, नाम तथा आकार से रहित होती है। जैसे ही हम उसे कोई नाम, आकार देते हैं वह सविकल्प हो जाता है। निर्विकल्प शुद्ध संवेदना है, उसमें हमारा मस्तिष्क कुछ निर्मित नहीं करता है। इसी प्रकार परमसत भी किसी विशिष्ट आकार में नहीं है किन्तु हमारे देखने का तरीका ऐसा होता है कि हम प्रत्येक वस्तु को किसी ढांचे में ही देखने की कोशिश करते हैं। राईट अपने अनुभवों के माध्यम से कहते हैं कि बहुत सारी वस्तुओं में जो ‘तत्व’ हम समझते हैं वो वस्तुत: उसमें होते ही नहीं। राबर्ट कहते हैं कि ऐसा सामान्यतः होता है कि वस्तु को मूल अर्थ हम देते हैं वह अधिकतर एकांगी या त्रृटिपूर्ण होता है। वस्तुओं के बारे में हमें जो कहानियां बतायी जाती हैं या हम वस्तुओं के बारे में हम जो स्वयं को कहानियां बताते हैं, वह हमको प्रभावित करता है तथा उसी के आधार पर हम किसी वस्तु को अर्थ भी देने लगते हैं। राईट कहते हैं कि अर्थ देकर हम वस्तुओं को एक ठप्पा दे देते हैं और फिर दुबारा उनसे सामना हुआ तो उसी ठप्पे के आधार पर बिना समय गंवाए उसे पहचान जाते हैं। सुत्त निपात में बुद्ध कहते हैं कि हम किसी मनुष्य के बारे में जो धारणाएं बना लेते हैं तो प्रत्येक समय उस मनुष्य से उसी धारणा के साथ व्यवहार करते हैं। किसी वस्तु, विषय या संसार पर ठप्पा लगाना नयी अनुभूतियों के लिए बाधक होता है। राईट कहते हैं सामान्य इन्द्रिय संवेदनों के बाद हम पृष्ठभूमि के ज्ञान का उपयोग करके वस्तु को अर्थ प्रदान करते हैं। उनका मानना है कि उसकी जांच करने पर वह वस्तु वैसी नहीं होती है जो अर्थ हम देते हैं। राईट इसी संदर्भ में शून्य को समझने की कोशिश करते हैं। वे कहते हैं कि वस्तुतः होता कुछ है अर्थ हम कुछ देते हैं। सचेतन ध्यान का अर्थ है कि आप अपनी भावनात्मक अनुभूतियों को सावधानी और स्पष्टता से देख सकें। आप यह चुनने में समर्थ हो जाएं कि किन भावनाओं के साथ चलना है जैसे- खुशी, आनन्द और प्रेम। यदि हम भावनाओं को चुनने में समर्थ हो जाते हैं तो एक स्वाभाविक स्वंत्रता आती हैI

   अब राबर्ट राईट अपनी यात्रा के  सबसे अहम पड़ाव पर हैं जहाँ उनकी अनुभूति भी एक ऊचाई पर हैI राईट कह रहे हैं कि रिट्रीट के दौरान एक दिन उन्होंने अपने पैर में एक जगह झुनझुनी महसूस किया तथा उसी समय एक चिड़िया बाहर गा रही थीI राईट के लिए विचित्र बात यह थी कि चिड़िया के गाने की अनुभूति पैर के झनझनाहट की अनुभूति की तरह ही महसूस हो रही थीI अर्थात राईट कहना चाहते हैं कि ऐसा लग रहा है जैसे उनके भीतर ही कोई गा रहा हैI राईट कह रहे हैं कि आप यह प्रश्न पूछ सकते हैं कि क्या मैं संसार के साथ एकत्व अनुभूत कर रहा था या मैं इस अनुभूति के नजदीक था कि मैं शून्य हूँ? यह अनुभूति ऐसी थी जहाँ बुद्धिज़्म के दो मूलभूत सिद्धांत अनात्म और शून्यवाद एक साथ आ जाते हैंI वे कहते हैं कि इस अनुभूति में मेरे और संसार के बीच जो दृष्टिगत परिसीमा है वो समाप्त हो गयीI और ऐसा नहीं है मैं किसी तार्किक प्रक्रिया से इस निष्कर्ष पहुंचा हूँI इनका कहना है कि मेरा पैर झनझनाहट की सूचना मुझ तक पहुंचाता है और चिड़िया गाने की सूचना पहुंचाती है! दोनों में अंतर क्या है? अब यह कहा जा सकता है कि झनझनाहट मेरे त्वचा या चमड़ी के भीतर हो रही है किन्तु चिड़िया का गायन हमारी त्वचा के बाहरI किन्तु क्या ये चमड़ी या त्वचा ही हमारी सीमा है जैसा हम समझते हैं? क्या ऐसा समझने का कोई अर्थ है कि जो कुछ हमारे त्वचा के भीतर है वो हमारा है तथा जो कुछ त्वचा के बाहर है वो दूसरे का है? राईट एक अमेरिकन मनोवैज्ञानिक विलियम जेम्स का कथन उद्धृत करते हैं कि ‘हमारे ‘मैं और मेरा’ कहने के बीच में रेखा खींचना बहुत कठिन हैI’ राईट एक बृहद विमर्श इस विषय पर करते हैं कि कैसे कुछ बाहरी बैक्टेरिया हमें प्रभावित करते हैंI इसी विमर्श के साथ राईट दो प्रश्न उठाते हैं- प्रथम ‘किस अर्थ में हमारे विचार, भावनाएं तथा अनुभूतियाँ हमारी हैं?’ जिसे अनात्मवाद के विमर्श में बुद्ध पूछते हैंI दूसरा- ‘किस अर्थ में बाहरी जगत हमारा भाग नहीं है?’ यह विमर्श वेदांत का हैI राईट कह रहे हैं कि पहला प्रश्न स्वाभाविक रूप से दूसरे प्रश्न तक जायेगाI राईट पूछते हैं कि मेरा पैर तथा चिड़िया, आंतरिक झनझनाहट तथा बाहरी गायन कब एकसाथ मिल जाते हैं? क्या मैंने यह अनुभूति की कि संसार के साथ मेरा एकत्व है या यह कि मैं कुछ नहीं हूँ? यदि मैं कुछ नहीं हूँ तो भी मैं बाहरी वस्तुओं से एकत्व अनुभूत करूँगाI वेबर कहते हैं कि यदि ‘आप कुछ नहीं हैं तभी आप सबकुछ हो सकते हैंI’ महायान बुद्धिज़्म भी इसी बात पर जोर देता है जिसे शून्यवाद कहते हैंI राईट के शब्दों में अद्वैत वेदांत का सिद्धांत है कि व्यक्तिगत आत्मा वस्तुतः एक सार्वभौमिक आत्मा का अंश हैI आत्मा ही ब्रह्म है तथा जीव और ब्रह्म में कोई भेद नहीं हैI हालाँकि बौद्ध दर्शन इस सिद्धांत को इसी अर्थ में स्वीकार नहीं करता हैI जो दोनों दर्शनों के बीच एक प्रमुख अंतर भी हैI इसमें दो बातें उभरकर सामने आती हैं एक- ‘आप सबकुछ हैं’ दूसरी- ‘आप कुछ नहीं हैंI’ राईट कह रहे हैं कि बुद्धिज़्म में ध्यानियों की गहरी अनुभूतियाँ तथा हिन्दुओं के अद्वैत वेदांत के ध्यानियों की गहरी अनुभूतियाँ मूलतः एक ही हैंI इसमें अंतर यह हो सकता है कि एक में आत्म-बंधन का विलय कुछ नहीं में हो रहा है, दूसरे में आत्म-बंधन का विलय दूसरी चीजों के साथ एकरूपता में हो रहा हैI राईट का कहना है कि मूल अनुभूति समान हैं किन्तु सैद्धांतिक रूप देने में अंतर हैI अद्वैत वेदांत में आत्मा की निरंतरता बनी रहती है न कि वह अनात्म में विलीन हो जाती हैI राईट का भी मानना है कि अद्वैत वेदांत का ढांचा इस अभिव्यक्ति में ज्यादा सक्षम हैI यह बात इस पुस्तक का मर्म हैI राबर्ट राईट ने दोनों के बीच बहुत भेद न मानते हुए इस बात का यहीं अंत किया हैI


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